>मध्य प्रदेश राज्य के ग्वालियर/भोपाल से सामने एक समाचार के मुताबिक नगर निगम द्वारा आयोजित एक शिलान्यास समारोह में मंच पर बैठने को लेकर हुए विवाद के बाद भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच जमकर पथराव हुआ. दोनों पक्षों के 35 कार्यकर्ता घायल हो गए, जिनमें से 6 की हालत गंभीर बताई गई है. ऐसे समाचार किसी भी चिंतनशील नागरिक को सोचने पर विवश कर देते हैं कि क्या यही राजनीति है. अगर यही राजनीति है तो खेदजनक है. आखिर ऐसे नेता व् कार्यकर्ता किस तरह की राजनीति कर रहे हैं और किन लोगों की खातिर राजनीति कर रहे हैं.
>अब ये कोई लुकी-छिपी बात नहीं रही कि अधिकतर राजनेताओं व् कार्यकर्तायों का चरित्र गिर चुका है. सत्ता प्राप्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं. ऐसे राजनीतिज्ञों से आम जनता क्या उम्मीद रख सकती है. अब लोग राजनीति में सेवा भावना के साथ नहीं आते. राजनीति में आने का मुख्या कारण सत्ता प्राप्ति व् धन का लालच है. सत्ता में आकर राजनीतिज्ञ क्या कुछ नहीं करते इस की ताज़ा मिसाल राजस्थान का चर्चित भंवरी काण्ड है.
>अगर राजनितिक पार्टियों के नेता व् कार्यकर्ता छोटी-छोटी बात पर हिंसा पर उतारू हो जायेंगे तो आम जनता का क्या होगा?
>आज देश में इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य किसी भी अन्य पेशे में प्रैक्टिस के लिए डिग्री लेना जरूरी है. लेकिन, राजनीति में ऐसा नहीं है. भला ऐसा क्यों हो रहा है? होना तो ये चाहिए कि सभी राजनितिक पदों के लिए न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए. राजनीति में काम करने लिए अधिकतम आयु सीमा होनी चाहिए. आज ऐसा नहीं है. राजनीति में कई ऐसे लोग हैं जो शिक्षित नहीं हैं. कब्र में पाँव होने के बावजूद सत्ता का मोह नहीं छोड़ते. इसी वजह से आज देश की हालत बाद से बदतर होती जा रही है. जिस व्यक्ति ने दस जमातें भी पास नहीं की होतीं, राजनीति में आकर आई.ए.एस/ आई.पी.एस. अधिकारियों पर शासन करता हैं. अधिकारीयों को जायज व् नाजायज काम करने के लिए मजबूर करता है. अगर कोई अधिकारी नेता के विरुद्ध कुछ कहने का दुस्साहस दिखता है तो उसे दिमागी तौर पर बीमार करार दे दिया जाता है.
>अंत में?
>क्या राजनितिक पदों के लिए न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए? साथ ही क्या राजनीति में अधिकतम आयु सीमा होनी चाहिए?
प्रिय मित्रो, बहस का जन्म, बहस के लिए ही किया गया है. देश-विदेश के मुद्दों पर ही नहीं बल्कि शहरों, कस्बों और देहातों के मुद्दों पर बहस करने के लिए. इसके अतिरिक्त और भी कई मुद्दे हैं. आशा रखता हूँ, आप सभी का सहयोग निरंतर मिलता रहेगा. आपके सहयोग से ही बहस, बहस बन पायेगी.....उम्मीद के साथ.... . आपका अपना, मनोज धीमान (मोबाइल; 9417600099)
शनिवार, 12 नवंबर 2011
शुक्रवार, 4 नवंबर 2011
योग का चमत्कार?
>इस में कोई दो राय नहीं की योग में बहुत शक्ति है. योग एक चमत्कार है. योग की शिक्षा देने वाले इस देश में पहले भी हुए हैं. लेकिन, योग का प्रचार-प्रसार आज के युग में जितना बाबा रामदेव ने किया है, उतना शायद ही किसी और ने किया होगा. उन्होंने योग को घर-घर में पहुंचा दिया है.
>इन दिनों बाबा रामदेव पंजाब के दौरे पर हैं. शुक्रवार को योग गुरु ने पंजाब के मोगा में भारतीय कबड्डी टीम के खिलाड़ियों के साथ कबड्डी खेल कर सभी को हैरान-परेशान कर दिया. लगभग दस मिनट तक उन्होंने खिलाड़ियों को जमकर छकाया. इस अंतराल में एक भी खिलाड़ी उन्हें छू तक नहीं पाया. दूसरी ओर उन्होंने "कबड्डी-कबड्डी" कहते हुए चारों खिलाड़ियों को मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया। खिलाड़ियों के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके दम का राज योग ही है. उन्होंने बताया कि कबड्डी सांस को साधने का खेल है और लगातार कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम के साथ योग करते रहने से सांस को बेहतर ढंग से साधा जा सकता है.
>यहाँ जिक्रयोग्य है कि इन दिनों पंजाब में मोगा के ढुढीके में विश्व कबड्डी कप का आयोजन चल रहा है.
>जो कुछ बाबा रामदेव कर रहे हैं, उसे नकारा नहीं जा सकता. कुछ लोग उनकी ऐसी हरकतों को नाटकबाजी भी कह सकते हैं ताकि मीडिया में बनें रहें. लेकिन, उनकी बातों से बहुत से लोग प्रभावित भी हो रहे हैं. इसी प्रभाव के चलते सुबह जल्दी बिस्तर से उठने लगे हैं, नियमित तौर पर कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम करने लगे हैं. यहाँ तक कि अपना खान-पान भी बदलने लगे हैं. जो काम आज ताज देश की सरकारें नहीं कर सकीं, वह बाबा रामदेव कर रहे हैं. अगर बाबा रामदेव देश की जनता को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक करने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं तो देश के नेता और सरकारें उन्हें कब तक नज़रअंदाज कर सकती हैं.
>देश व् राज्य की सरकारों को भी चाहिए कि वे योग को भी स्कूलों और कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करे. योग को केवल पाठ्यक्रम में शामिल ही ना किया जाये बल्कि अहम विषय के तौर पर शामिल किया जाये. जब युवाओं का मन और तन स्वस्थ होगा तो वे अवश्य ही अच्छे नागरिक बनेंगे. इससे लोगों में अपराधिक प्रवृति भी कम होगी. साथ ही उनकी विचार शक्ति भी मजबूत और सकारात्मक होगी. देश में योग पर खोज केंद्र भी स्थापित किये जा सकते हैं. योग के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. जरूरत है तो बस इन संभावनाओं को कैश कर लेने की.
>अंत में;
>देश में योग को प्रफुल्लित करने के लिए केंद्र व् राज्य सरकारों की क्या जिम्मेवारी बनती है?
>इन दिनों बाबा रामदेव पंजाब के दौरे पर हैं. शुक्रवार को योग गुरु ने पंजाब के मोगा में भारतीय कबड्डी टीम के खिलाड़ियों के साथ कबड्डी खेल कर सभी को हैरान-परेशान कर दिया. लगभग दस मिनट तक उन्होंने खिलाड़ियों को जमकर छकाया. इस अंतराल में एक भी खिलाड़ी उन्हें छू तक नहीं पाया. दूसरी ओर उन्होंने "कबड्डी-कबड्डी" कहते हुए चारों खिलाड़ियों को मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया। खिलाड़ियों के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके दम का राज योग ही है. उन्होंने बताया कि कबड्डी सांस को साधने का खेल है और लगातार कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम के साथ योग करते रहने से सांस को बेहतर ढंग से साधा जा सकता है.
>यहाँ जिक्रयोग्य है कि इन दिनों पंजाब में मोगा के ढुढीके में विश्व कबड्डी कप का आयोजन चल रहा है.
>जो कुछ बाबा रामदेव कर रहे हैं, उसे नकारा नहीं जा सकता. कुछ लोग उनकी ऐसी हरकतों को नाटकबाजी भी कह सकते हैं ताकि मीडिया में बनें रहें. लेकिन, उनकी बातों से बहुत से लोग प्रभावित भी हो रहे हैं. इसी प्रभाव के चलते सुबह जल्दी बिस्तर से उठने लगे हैं, नियमित तौर पर कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम करने लगे हैं. यहाँ तक कि अपना खान-पान भी बदलने लगे हैं. जो काम आज ताज देश की सरकारें नहीं कर सकीं, वह बाबा रामदेव कर रहे हैं. अगर बाबा रामदेव देश की जनता को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक करने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं तो देश के नेता और सरकारें उन्हें कब तक नज़रअंदाज कर सकती हैं.
>देश व् राज्य की सरकारों को भी चाहिए कि वे योग को भी स्कूलों और कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करे. योग को केवल पाठ्यक्रम में शामिल ही ना किया जाये बल्कि अहम विषय के तौर पर शामिल किया जाये. जब युवाओं का मन और तन स्वस्थ होगा तो वे अवश्य ही अच्छे नागरिक बनेंगे. इससे लोगों में अपराधिक प्रवृति भी कम होगी. साथ ही उनकी विचार शक्ति भी मजबूत और सकारात्मक होगी. देश में योग पर खोज केंद्र भी स्थापित किये जा सकते हैं. योग के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. जरूरत है तो बस इन संभावनाओं को कैश कर लेने की.
>अंत में;
>देश में योग को प्रफुल्लित करने के लिए केंद्र व् राज्य सरकारों की क्या जिम्मेवारी बनती है?
बुधवार, 2 नवंबर 2011
अगर ऐसा हो जाये?
>एक अच्छी खबर है कि पंजाब की लवली प्रोफैशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) के कम्युनिटी सर्विस सेल द्वारा दस एनएसएस यूनिट्स का गठन किया गया. इन यूनिट्स के अंतर्गत 2 ,000 से अधिक छात्रों ने स्वेच्छापूर्वक स्वयं को रजिस्टर्ड करवाया है. हर स्वयंसेवक दो वर्षों में 240 घंटे सामुदायिक कार्यों को देंगे. अंततः छात्रों में अनुशासन पैदा होगा और उनका बेहतर चरित्र निर्माण होगा. इसके अतिरिक्त छात्रों का स्वस्थ्य बेहतर होगा और वे देश की संस्कृति को अच्छे ढंग से समझ सकेंगे.
>एलपीयू के डायरेक्टर-जनरल एच. आर. सिंगला का कहना है कि एनएसएस यूनिट्स का गठन इसलिए किया गया है ताकि आज के युवा समाज सेवा कर सकें और कुछ बेहतर सीख सकें. उनका ये भी मानना है कि ऐसी गतिविधिओं से युवा ना केवल अपनी बेहतरी कर सकेंगे बल्कि देश के विकास में भी अहम भूमिका अदा कर पाएंगे.
>सबसे दिलचस्प पहलू तो ये है कि यूनिवर्सिटी की जिन छात्र-छात्राओं ने स्वयं को एनएसएस यूनिट्स के लिए रजिस्टर्ड करवाया है, उनके विचार उच्च दर्जे के हैं. मधु ओबेरॉय, संतोष, गुरजीत राणा, सामुएल, आबिद, रुखसाना, जतिंदर व् अन्य छात्र-छात्राओं का कहना है कि इस पहल से उन्हें समाज के प्रति भागीदारी, सेवा और उपलब्धियों को विकसित करने का मौका मिला है.
>आज देश भर के युवाओं में मधु ओबेरॉय, संतोष और उनके अन्य साथियों जैसा जज्बा पैदा करने की आवश्यकता है जबकि देश के युवाओं की अच्छी खासी संख्या भटकाव के मोड़ पर है. भटकाव की इस स्थिति में युवाओं को कोई सही राह दिखानेवाला नहीं मिल रहा है. आज देश के अधिकतर युवा पश्चिम की सभ्यता का आँखें मूँद कर अनुसरण कर रहे हैं, अपने बड़े-बुजुर्गों की इज्ज़त करना भूल चुके हैं. ऐसी बात नहीं है कि युवाओं को दूसरों का अनुसरण नहीं करना चाहिए. वे ऐसा जरूर करें. मगर, थोडा सोच-समझ कर. ऐसा ना हो कि भविष्य में उन्हें पछताना पड़े.
>आजकल हम लोग छोटी-छोटी बात के लिए सरकार का मूंह ताकते हैं. युवाओं की स्थिति बदले, इसके लिए भी सरकार की तरफ ही देख रहे हैं. स्वयं कुछ नहीं कर रहे. वैसे युवाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेवारी ना केवल माता-पिता की बनती है, बल्कि शैक्षणिक संस्थायों की भी बनती है. शैक्षणिक संस्थायों को चाहिए की वे कुछ एक छात्र-छात्राओं को ही कम्युनिटी सर्विस के लिए ना चुनें. संस्था के सभी छात्र-छात्राओं को इसका अवसर दें. अगर ऐसा हो जाता है तो देश में एक दिन नयी क्रांति आ सकती है जिसकी किसी ने कल्पना भी ना की होगी.
>अंत में:
>क्या किसी भी शैक्षणिक संस्था में सभी छात्र-छात्राओं को कम्युनिटी सर्विस का अवसर दिया जाना चाहिए?
>एलपीयू के डायरेक्टर-जनरल एच. आर. सिंगला का कहना है कि एनएसएस यूनिट्स का गठन इसलिए किया गया है ताकि आज के युवा समाज सेवा कर सकें और कुछ बेहतर सीख सकें. उनका ये भी मानना है कि ऐसी गतिविधिओं से युवा ना केवल अपनी बेहतरी कर सकेंगे बल्कि देश के विकास में भी अहम भूमिका अदा कर पाएंगे.
>सबसे दिलचस्प पहलू तो ये है कि यूनिवर्सिटी की जिन छात्र-छात्राओं ने स्वयं को एनएसएस यूनिट्स के लिए रजिस्टर्ड करवाया है, उनके विचार उच्च दर्जे के हैं. मधु ओबेरॉय, संतोष, गुरजीत राणा, सामुएल, आबिद, रुखसाना, जतिंदर व् अन्य छात्र-छात्राओं का कहना है कि इस पहल से उन्हें समाज के प्रति भागीदारी, सेवा और उपलब्धियों को विकसित करने का मौका मिला है.
>आज देश भर के युवाओं में मधु ओबेरॉय, संतोष और उनके अन्य साथियों जैसा जज्बा पैदा करने की आवश्यकता है जबकि देश के युवाओं की अच्छी खासी संख्या भटकाव के मोड़ पर है. भटकाव की इस स्थिति में युवाओं को कोई सही राह दिखानेवाला नहीं मिल रहा है. आज देश के अधिकतर युवा पश्चिम की सभ्यता का आँखें मूँद कर अनुसरण कर रहे हैं, अपने बड़े-बुजुर्गों की इज्ज़त करना भूल चुके हैं. ऐसी बात नहीं है कि युवाओं को दूसरों का अनुसरण नहीं करना चाहिए. वे ऐसा जरूर करें. मगर, थोडा सोच-समझ कर. ऐसा ना हो कि भविष्य में उन्हें पछताना पड़े.
>आजकल हम लोग छोटी-छोटी बात के लिए सरकार का मूंह ताकते हैं. युवाओं की स्थिति बदले, इसके लिए भी सरकार की तरफ ही देख रहे हैं. स्वयं कुछ नहीं कर रहे. वैसे युवाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेवारी ना केवल माता-पिता की बनती है, बल्कि शैक्षणिक संस्थायों की भी बनती है. शैक्षणिक संस्थायों को चाहिए की वे कुछ एक छात्र-छात्राओं को ही कम्युनिटी सर्विस के लिए ना चुनें. संस्था के सभी छात्र-छात्राओं को इसका अवसर दें. अगर ऐसा हो जाता है तो देश में एक दिन नयी क्रांति आ सकती है जिसकी किसी ने कल्पना भी ना की होगी.
>अंत में:
>क्या किसी भी शैक्षणिक संस्था में सभी छात्र-छात्राओं को कम्युनिटी सर्विस का अवसर दिया जाना चाहिए?
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)