सोमवार, 19 सितंबर 2011

टोपी पर इतना बवाल क्यों?

ख़बरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा है कि उन्होंने एक मुस्लिम धर्मगुरु की तरफ से भेंट की गई टोपी को कथित तौर पर लेने से मना कर दिया। मुस्लिम धर्मगुरु सैय्यद ईमाम शाही सैय्यद ने गुजरात के मुख्यमंत्री को एक टोपी भेंट की थी। लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टोपी को लेने से मना कर दिया। हालांकि, मोदी ने मुस्लिम धर्म गुरु की तरफ से दी गई शॉल को स्वीकार किया। सैय्यद ने कहा, 'मुझे इससे बहुत दुख हुआ है। वह हर समुदाय की टोपी और पगड़ी पहन रहे हैं। लेकिन उन्होंने मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया।'
आज सुबह से ही टीवी पर यही खबर चल रही है. ऐसा लगता है कि टीवी चैनलवालों के पास ख़बरों का आकाल पद गया है. मैं मुस्लिम धर्मगुरु की भावनाओं के साथ सहमत हूँ. लेकिन, कोई इंसान किसी दूसरे को इस बात के लिए मजबूर नहीं कर संता कि वह उसकी दी हुई वस्तु स्वीकार करे. वैसे भी, मीडिया और अन्य सियासी दलों के नेताओं को टोपी के इस मुद्दे पर इतना बवाल खड़ा नहीं करना चाहिए. उन्हें यह बात गंभीरता से सोचनी चाहिए कि इस मुद्दे पर बवाल मचने से देश में किस तरह के हालात बन सकते हैं. देश में टोपी से बड़े भी कई मुद्दे हैं. मसलन, देहातों का शहरीकरण होना जिस की वजह से खेतिहर भूमि लगातार कम हो रही है, ऋण के बोझ तले दबे किसानों द्वारा आत्महत्या करना, बढ़ती महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, भ्रष्टाचार इत्यादि-इत्यादि.
सवाल है कि अगर मीडिया के कुछ लोगों, कुछ सियासी लोगों एवं अन्य को लगता है कि नरेंद्र मोदी सभी धर्मों का सम्मान नहीं करते तो गुजरात की जनता उन्हें बार-बार अपना मत देकर सत्ता क्यों सौंपती है.
अंत में---
क्या टोपी का मसला देश हित में तुरंत छोड़ देना चाहिए?

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