रविवार, 2 अक्टूबर 2011

ईश्वरीय शक्ति से डरो

एक बार फिर. हाँ, एक बार फिर किसी माँ ने अविकसित बच्ची के शव को कचरे में फेंका है. इस बार ये घटना सिविल अस्पताल ठियोग, शिमला, में घटित हुई है. करीब 28 सप्ताह की बच्ची का शव बायोमेडिकल वेस्ट से मिला है. ऐसी घटनाएँ दिल को पसीज देने वाली हैं. माँ को ममता की देवी माना जाता है. लेकिन इस तरह की घटनाएँ माँ का एक दूसरा ही रूप प्रस्तुत करती हैं, एक क्रूर माँ का रूप. यकीन नहीं होता कि कोई भी औरत इस हद तक गिर सकती है. ऐसी औरत को ऐसा करते हुए एक बार ये सोच लेना चाहिए कि अगर उस को जन्म देने वाली उसकी अपनी माँ उसके साथ ऐसा सलूक करती तो आज वह जिंदा ना होती. बरसों पहले किसी कूड़े के ढेर पर दम तोड़ गयी होती. ऐसी घटनाओं से जहाँ समाज कलंकित होता है वहीँ मानवता को भी ठेस पहुँचती है. आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों होती है कि किसी भी माँ को ऐसा शर्मनाक कदम उठाना पड़ता है. इस पर समाज को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है. इस में उस बच्ची का क्या कसूर था कि उसे जन्म से पहले ही मार दिया गया है. हो सकता वह बड़ी हो कर ऊंचा ओहदा पा लेती. कोई विज्ञानिक, डॉक्टर, मंत्री या देश की प्रधानमंत्री ही बन जाती. अविकसित बच्ची के साथ तो अन्याय हुआ ही है, उसकी माँ की भी ये बदनसीबी है कि उस ने फूल जैसी नाजुक बच्ची पर इतना जुल्म किया. कोई भी माँ ऐसा पापकर्म करने करने से पहले इतना जरूर सोच ले कि इस संसार में बस लेन - देन ही तो है. जब हिसाब - किताब मुकम्मल हो जाता है तो इंसान दुनिया से विदा हो जाता है. वक्त आयेगा जब उस बदनसीब माँ को अपने पापकर्म का हिसाब देना पडेगा. अंत में: अविकसित बच्चों को कचरे के डिब्बों से बचाने के लिए समाज क्या भूमिका अदा कर सकता है?

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