>भोपाल से एक बड़ी अच्छी खबर आयी है. समाज में बेटियों के महत्व को रेखांकित करने के मकसद से मध्यप्रदेश में अनूठा 'बेटी बचाओ' अभियान पांच अक्टूबर से शुरू होगा. इस अभियान के दौरान बेटियों के प्रति समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण लाने और मानसिकता बदलने के लिए समाज को जागृत करने का आग्रह किया जाएगा.
>ये एक प्रशंशनीय पहल है. वैसे इस से पहले पंजाब में ऐसा ही एक अभियान बठिंडा से शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने भी चलाया था. बल्कि, अभी भी जारी है. चाहिए तो ये कि अन्य प्रदेशों की सरकारें भी ऐसा ही अभियान चलायें. आज जरूरत है कि आम लोगों को जागरूक किया जाये कि बेटे ओर बेटी में कोई अंतर नहीं है. इस में कोई दो राय नहीं कि बेटी ने शादी के बाद अपने ससुराल घर चले जाना होता है. ज़माना बदल चुका है. आज कल बेटे भी घर जंवाई बनने में देर नहीं लगाते. या फिर शादी के बाद अलग से अपना घर बसाने को प्राथमिकता देते हैं. अंत में बूढ़े माता-पिता घर में अकेले ही रहते हैं. लाचार सी हालत में.
>बेटी तो फिर भी माँ-बाप का हाल-चाल पूछने चली जाती है. बेटा बेचारगी का शिकार बना रहता है. पत्नी के डर के कारण माता-पिता के पास भी नहीं जाता. यकीनन ऐसा सभी परिवारों में नहीं होता. लेकिन, ऐसा सब कुछ अक्सर देखने सुनने को मिल जाता है. वैसे भी बेटी किसी से कम तो नहीं. आज की बेटी क्या कुछ नहीं बन सकती. वह बड़े से बड़े ओहदे पर पहुँच चुकी है. मर्दों के कंधे के साथ कन्धा मिला कर मेहनत कर रही है. कई मामलों में तो देखा गया है कि बेटी, बेटे से अधिक जिम्मेवार साबित होती है. तो फिर बेटी को नाकारा क्यों जाये . उसका स्वागत क्यों ना किया जाये. इसलिए आयें, हम सब भी 'बेटी बचाओ' अभियान में आज से ही शामिल हो जाएँ.
>अंत में;
>बेटी बचाओ' अभियान में आम लोग कैसे सम्मिलित हो सकते हैं?
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