रविवार, 23 अक्टूबर 2011

गद्दाफी की मौत पर उठ रहे सवाल?


>लीबिया के सैन्य तानाशाह कर्नल मुअम्मार गद्दाफी की हत्‍या को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. जी हाँ, श्रीलंका ने लीबिया के पूर्व शासक मुअम्‍मर गद्दाफी की हत्‍या की निंदा करते हुए सैन्‍य तानाशाह की मौत को लेकर पूरे मामले की जांच किए जाने की मांग की है. ख़बरों के मुताबिक श्रीलंका के विदेश मंत्रालय की ओर से कड़े शब्‍दों में जारी बयान में कहा है कि श्रीलंका की सरकार गद्दाफी की मौत से जुड़े हालात पर सफाई चाहती है. गद्दाफी की श्रीलंका से पुरानी दोस्‍ती रही है.
>ख़बरों में बताया गया है कि सिरते में जिस वक्‍त एनटीसी के लड़ाकों ने गद्दाफी को पकड़ा, उस वक्‍त सैन्‍य तानाशाह ने लड़ाकों को जान बख्‍शने के एवज में काफी मात्रा में धन-दौलत देने का वादा किया.  हमाद मुफ्ती अली नाम के एक लड़ाके ने बताया कि गद्दाफी अपनी जान के एवज में कुछ भी देने के लिए तैयार था. उसने कहा कि उसके पास काफी सोना और धन दौलत है.
>आखिर जनता के विद्रोह ने एक तानाशाह से मुक्ति पा ही ली. गद्दाफी ने लगभग 42 वर्ष तक लीबिया पर शासन किया. इस दौरान उसने अपने देश की जनता पर कई तरह के अत्याचार किये. यहाँ तक कि उन औरतों को भी बक्शा नहीं गया जो निरंतर उसकी सुरक्षा में तैनात रहा करती थीं. उनके साथ बलात्कार तक किये गए. अपने शासन के दौरान गद्दाफी ने अपार धन -दौलत एकत्र की. लेकिन, अंतिम समय इस धन - दौलत ने उसका साथ ना दिया. उसने लड़ाकों को धन-दौलत देने का लालच दिया. लेकिन, किसी ने उसकी एक ना सुनी. अंत में, गद्दाफी का जो हश्र हुआ उसके बारे में सभी जानते ही हैं. 
>हर तानाशाह का एक दिन अंत होता है. और अंत भी बहुत बुरा होता है. इतिहास खोल कर देखा जाये तो सभी तानाशाहों का गद्दाफी जैसा ही अंत होता है. जनता में जब तानाशाही के प्रति रोष उत्पन्न होता है तो तानाशाही और तानाशाह का अंत होता ही है. सत्ता में बैठा तानाशाह ये समझ बैठता है कि इस धरती पर वह इंसान नहीं, भगवान् है और शेष लोग तो कीड़े-मकौड़े भर हैं. लेकिन, गद्दाफी जैसा तानाशाह अंत में ऐसी स्थिति में होता है कि अपनी भूल सुधारने लायक तो क्या माफ़ी के काबिल भी नहीं रहता. 
>गद्दाफी की मौत उन शासकों के लिए सबक है जो अपने अधीन प्रजा पर अत्याचार करते हैं.  बेशक गद्दाफी के खात्‍मे के तरीके को लेकर जांच किए जाने की अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर मांग उठ रही है. लगता नहीं कि ऐसी मांगों का अब कोई औचित्य शेष रह गया है. ऐसी मांग उठाने वाले तब कहाँ थे जब गद्दाफी की तानाशाही जारी थी और लीबिया की जनता पिस रही थी, जुल्म सह रही थी? ये जनता का गुस्सा ही था कि गद्दाफी की जान बख्शने के हक में कोई भी नहीं था. उसे गली में घूम रहे किसी आवारा कुत्ते की मौत ही मार दिया गया. ऐसी मौत जो दर्दनाक थी......बिलकुल वैसी ही, जैसे उसने भी ना जाने कितने लीबियावासियों को दी होगी.
>अंत में?
>क्या गद्दाफी के खात्‍मे के तरीके को लेकर जांच किए जाने की अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर की जा रही मांग में अब कोई औचित्य शेष रह गया है.   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें