>दस रुपए को लेकर दुकानदार के बेटे की पिटाई की गयी है. आप विशवास करें या ना करें, ऐसा वास्तव में हुआ है. ये वाक्य बालूगंज, शिमला, स्थित एक दुकान में हुआ है. हमलावर युवकों ने दस रुपए को लेकर दुकानदार के बेटे की पिटाई कर डाली. साथ ही दुकान के शीशे भी फोड़ डाले। खबर के मुताबिक आरोपी युवक यूनिवर्सिटी के छात्र बताए जा रहे हैं. आठ छात्र शुक्रवार रात चौक पर स्थित दुकान पर पहुंचे. दुकान पर व्यापारी का नाबालिग बेटा मौजूद था. सामान खरीदने के बाद उनकी व्यापारी के बेटे से दस रुपए के लिए कहासुनी हो गई. उन्होंने तोडफ़ोड़ की और उसकी पिटाई कर डाली.
>पहली नज़र में लगता है कि यह एक मामूली सी घटना है. मगर, इस छोटी सी घटना के कारण कई प्रश्न खड़े होते हैं. दुकानदार का बेटा नाबालिग था. मालूम नहीं वह पढ़ा - लिखा भी होगा या नहीं. लेकिन, जिन युवकों ने उस पर कथित तौर और छोटी सी बात के लिए आक्रमण किया वे लोग तो अनपढ़ ना थे, यूनिवर्सिटी के छात्र थे. ऐसे किसी के साथ झगडा करना, तोड़-फोड़ करना सभ्य समाज में शोभा नहीं देता. क्या शिक्षा के यही अर्थ हैं कि शरेआम किसी पर भी धावा बोल दो. अगर उन्हें शिकायत थी तो दुकानदार की प्रतीक्षा कर लेते. अपनी शिकायत उसके सामने रखते, ना कि नाबालिग बच्चे को पीटते. इस तरह तो शिक्षा के कोई मायने नहीं शेष नहीं रह जाते. अगर वे स्वयं ही समाज में इस तरह का व्यवहार करेंगे तो अपनों से छोटों के लिए रोल मॉडल किस तरह बनेंगे.
>आज जरूरत है कि युवकों में धैर्य उत्पन्न हो. इस तरह छोटी - छोटी बातों पर अपना धैर्य खोना अच्छी बात नहीं है. इस तरह से वे कोई बड़ा अपराध भी कर सकते हैं. समाज में हमेशा के लिए अपनी मान -मर्यादा खो सकते हैं. पढ़े - लिखे युवकों को तर्क पर अपनी बात रखनी चाहिए. हर संभव प्लेटफोर्म पर जाना चाहिए. लेकिन, हिंसा का दामन थामना नहीं चाहिए. आज भी अहिंसा में बहुत बड़ी शक्ति है. युवकों को चाहिए कि वे अपने अन्दर इस शक्ति को पहचाने ओर इस का सदुपयोग करें.
>अंत में:
>आपकी नज़र में शिक्षा के सही मायने क्या हैं?
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