जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बुधवार को संसद हमले के दोषी अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो सकी. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस विधायकों के बीच झड़पों के कारण सदन की कार्यवाही कल तक स्थगित कर दी गई.
लेकिन, विचारयोग्य बात तो ये है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का प्रस्ताव विधानसभा में रखा ही क्यों गया. अफजल गुरु को पहले ही सजा सुनायी जा चुकी है. उस पर एक संगीन जुर्म सिद्ध हो चूका है. ख़बरों के मुताबिक भाजपा ने अफजल की दया याचिका से सम्बंधित प्रस्ताव पर भी जमकर हंगामा किया और ‘राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव वापस करो, वापस करो’ के नारे लगाए।
भाजपा का ये कदम शायद गलत भी नहीं है. अगर उसने अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव करार दिया है तो इस में गलत भी क्या है. ऐसा प्रस्ताव लाने वाले ये मत भूलें कि वे भी भारत में रहते हैं. उन्हें ये बात नहीं भूल जानी चाहिए कि अफजल गुरु संसद पर हमले का दोषी है. संसद पर हमला यानी देश पर हमला. क्या कोई भी नागरिक इस बात को स्वीकार कर लेगा कि ऐसे खतरनाक मुजरिम को दया दे देनी चाहिए?
वैसे भी कानून को अपना कार्य करने देना चाहिए. हर बात में राजनीति करना अच्छी बात नहीं. संवेदनशील मुद्दों पर तो वैसे भी राजनीति करने से परहेज करना चाहिए. अगर आंतकवादियों के प्रति दया दिखाई जाती रही तो उनके हौंसले बुलंद ही होंगे, कमजोर नहीं. ऐसे मामलों में तो ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि अन्य आंतकवादियों को भी सबक मिले.
देश में राजनीति करने नेताओं को चाहिए कि वे अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या उन्हें संवेदनशील मामलों पर राजनीति करनी चाहिए.
अंत में;
क्या संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति की इजाजत होनी चाहिए?
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