गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आखिर किस पर विश्वास करें?

जी हाँ. आज देश के लगभग हर नागरिक के मन में यही प्रश्न घूम रहा है. आखिर विश्वास किया जाये तो किस पर किया जाये. देश के जो नेता शराफत से ओत-प्रोत लगते हैं वे भी अब घोटालों की दलदल में फंसे हुए दिख रहे हैं.

और तो और, अब पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम का नाम शामिल हो गया है. आरटीआई के जरिए सामने आई वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे. लेकिन उन्होंने 30 जनवरी, 2008 को ए राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी. उन्होंने कहा- मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू शेयरिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता। यह चिट्ठी 25 मार्च, 2011 को लिखी गई थी. चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी. 11 पन्नों की ये चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदंबरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्टी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है.

अब कहने या सोचने की और कोई जरूरत नहीं है.

जिस तरह से बड़े - बड़े नेताओं का नाम घोटालों में शामिल होता जा रहा है, देश की जनता में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है. जनता इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर वह करे भी तो क्या करे. चुनाव में किस को वोट डाले, और डाले भी तो क्यों? जनता को मजबूरी में वोट तो डालनी ही पड़ती है. आखिर सरकार का गठन भी तो करना होता है, जिस ने देश की जनता पर शासन करना होता है. सिर्फ शासन. बदले में देश की जनता को महंगाई तोहफे में मिलती है. और बड़े-बड़े घोटाले किये जाते हैं.नेताओं द्वारा जनता सोचने पर मजबूर है कि क्या सरकार में बैठे नेताओं को मात्र घोटालों के लिए ही चुन कर भेजा गया है? देश के प्रति उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं? आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा.

बेशक अन्ना टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. आशा है, वह सुबह जरूर आयेगी जब देश के हर नेता की जनता के सामने मुकम्मल जवाबदेही होगी.

न्यायसंगत बात तो यह होनी चाहिए कि घोटालों में शामिल नेताओं से सारी रकम वापस वसूली जाये. साथ ही ऐसे नेताओं को हमेशा के लिए चुनाव में खड़े से वर्जित किया जाये . जनता को भी चहिये कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार होना चाहिए.

अंत में:

भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के साथ कैसा व्यवहार होने चाहिए?

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