गुरुवार, 29 सितंबर 2011

ऐसे नेता? ....तौबा-तौबा...

कितनी हैरानकुन बात है की जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को कहा कि संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से राज्य में आतंकवादी हमले दोबारा शुरू हो सकते हैं जिसे लेकर वह चिंतित हैं. उनका कहना है कि जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के नेता मुहम्मद मकबूल भट्ट को वर्ष 1984 में फांसी की सजा देने के बाद कश्मीर में आतंकवादियों की एक फौज तैयार हो गई थी. उन्हें चिंता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक फिर बढ़ जाएंगी जो इस समय काफी कम हैं. उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वह अफजल गुरु को मृत्युदंड दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं.

आखिर इस वक्तव्य का क्या मतलब है. क्या उमर अब्दुल्ला अपनी कमजोरी को छुपाना चाहते हैं या फिर इस वक्तव्य के पीछे कोई और बात है. उन्हें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं. अगर उन जैसे लोग ही मीडिया में इस तरह के वक्तव्य देंगे तो जनता में क्या सन्देश जाएगा. उनका द्वारा दिया गया ब्यान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. आंतकवाद कि समस्या को सख्ती से ही निबटा जा सकता है, प्यार से नहीं. पंजाब में भी आंतकवाद पैदा हुआ था. लेकिन, उसे सख्ती व् होशियारी से ख़त्म किया गया. ना तो सुरक्षा कर्मिओं ने और ना ही राज्य के नेताओं ने आंतकवाद के आगे अपने घुटने टेके. अगर किसी नेता ने राज्य या देश पर शासन करना है तो उसे दृढ़ता तो दिखानी ही पड़ेगी. सबसे पहले उसे देश के बारे में सोचना पडेगा. अन्यथा इसका भारी खामियाजा भुगतना पडेगा.

अगर उमर अब्दुल्ला को लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक बार फिर बढ़ जाएंगी तो उन्हें किस ने कहा है कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहें. वे जब चाहे इस्तीफ़ा दे सकते हैं. शायद जम्मू एवं कश्मीर को उनसे बेहतर मुख्यमंत्री मिल जाये.

अंत में;

क्या आपको लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं बढ़ जाएंगी?

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