शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

विदेश यात्राएं किस लिए?

अक्सर देखने में आया है कि सत्ता में आने के बाद मंत्री महोदय धडाधड विदेश यात्राएं करते हैं. यात्रा करना जरूरी हो चाहे ना हो, वे यात्रा अवश्य करते हैं. दरअसल, उन्हें विदेशी धरती और विदेशी लोगों का मोह हो चूका है. अपनी इन यात्राओं पर मंत्री महोदय करोड़ों रुपये खर्च कर डालते हैं. देश के ये मंत्री महोदय एक बार भी ये नहीं सोचते कि जिस पैसे पर वे लोग विदेश घूमने जा रहे हैं वह इस देश की सौ करोड़ जनता का ही है.

आज ही एक खबर में बताया गया है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पांच सालों में विदेश यात्राओं पर 2 करोड़ 4 लाख 36 हजार 825 रुपए खर्च किए. यह आंकडे जुलाई 2006 से जुलाई 2011 के बीच के हैं इस दौरान मोंटेक ने 16 बार सरकारी खर्चे पर 35 विदेश यात्राएं की. आरटीआई के तहत मांगी एक जानकारी के मुताबिक अहलूवालिया ने इसमें से केवल एक बार अपनी जेब से विदेश यात्रा का खर्च चुकाया. इस जानकारी के मुताबिक मोटंके ने पिछले पांच साल के दौरान 16 बार अमेरिका की सरकारी यात्रा की चार बार ब्रिटेन और चार बार सिंगापुर की यात्रा की. इसके अलावा अहलूवालिया दो-दो बार चीन और फ्रांस की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर की. यही नहीं स्विटजरलैंड, सऊदी अरब, कनाडा, ओमान, बहरीन कोरिया और जापान की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर निपटा डाली.

यह तो केवल एक उदाहरण है. अगर सरकार के एक-एक मंत्री का हिसाब-किताब किया जाए तो विदेश यात्राओं पर होने वाले खर्च का आंकड़ा अरबों में चला जाएगा. सरकार अगर चाहे तो इन यात्राओं पर अच्छे से लगाम लगा सकती है. केवल उन्हीं यात्राओं की इजाजत दी जाए जिन के बिना गुजरा संभव नहीं है. इस से एक बड़ी रकम बच सकती है, जिस से कई सरकारी योजनाओं को मुकम्मल किया जा सकता है. वैसे भी आजकल आईटी का जमाना है. क्यों नहीं विडियो कांफेरेंसस का सहारा लिया जाता?

एक बात और. अब जब कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने की बात की जा रही है तो क्यों ना मंत्रिओं के विदेशी दौरों संबंधी मुकम्मल जानकारी सम्बंधित मंत्रालयों की वेबसाइट पर डाली जाए ताकि देश कि जनता को भी मालूम हो सके कि यात्रा का उद्देश्य क्या था, उस पर कितना खर्चा हुआ और उससे हासिल क्या हुआ.

अंत में:

क्या मंत्रिओं की यात्राओं का मुकम्मल हिसाब-किताब सार्वजानिक किया जाना चाहिए?

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