>आए दिन समाचारपत्रों में सड़क दुर्घटनाओं की दु:खद ख़बरें प्रकाशित होती हैं. हम सभी एक नजर डाल कर खबर पढ़ते हैं, कुछ देर बाद सब कुछ भूल जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही ना हो. लेकिन, वास्तविकता ये है
कि हालात बेहद चिंताजनक हैं. प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में हर साल करीब चार हजार लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और करीब 16 लोग हर रोज घायल हो रहे हैं. वर्ष 2010 में राज्य में कुल 6 ,641 सड़क हादसे हुए. इनमें 3 ,424 लोगों की मौत हुई तो 5,854 लोग घायल हुए हैं. राज्य के अकेले लुधियाना शहर की स्थिति अति गंभीर है. यहां साल 2010 में 222 सड़क दुर्घटनाओं में 227 लोगों की मौत हुई.
>आखिर ऐसा क्या है कि सड़क दुर्घटनाएं रुक नहीं पा रहीं. इस के पीछे कई कारण हो सकते हैं. असल बात तो ये है कि आज की भागमभाग जिंदगी में हर कोई जल्दी में है. लोगों के पास समय कम है और काम ज्यादा. जैसे - जैसे आईटी का प्रसार हो रहा है, जिंदगी की गति तेज और तेज होती जा रही है. देखने में लगता है कि हमें सुख - सुविधाएँ मिल रही है. मगर ऐसा वास्तव में है नहीं. मोबाइल हो या इन्टरनेट, या फिर कोई और नया उपकरण, इस से काम कि जिम्मेवारी बढ़ती ही है, कम नहीं होती. यही वजह है कि हम में से हर कोई तेजी में है. हर व्यक्ति वक़्त को थाम लेना चाहता है. इसी जल्दबाजी का नतीजा अक्सर ये होता है कि हम में से ही कई लोग सड़क पर दुर्घटना का शिकार बन जाते हैं.
>सड़क दुर्घटनाओं के पीछे मदिरा या अन्य नशे भी एक कारण हैं. नशे की लत की वजह से इंसान खुद तो मौत के मुंह में जाता ही है, अपने पारिवारिक सदस्यों का जीवन भी खतरे में डाल देता है. कई बार दुर्घटना स्वयं घट जाती है. इस के पीछे घटिया ऑटो पार्ट्स होते हैं जो कि जाली होते हैं.
>अक्सर देखने में आता है कि युवा वाहनों पर बैठ कर मटरगश्ती करते हैं. सड़क को अपने बाप की जागीर समझ कर यहाँ-वहां तेज रफ्तारी से घूमते हैं. और फिर, दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं.
>बहुत बार ऐसा भी होता है कि सडकों की खस्ता हालत की वजह से दुर्घटनाएं हो जाती हैं. कई बार सरकारी करमचारियों की लापरवाही भी इस की वजह बन जाती है. मसलन, कई बार अँधेरे में चालक दुर्घटना का शिकार बन जाते हैं क्योंकि मैनहोल बिना ढक्कन के होता है.
>अगर हम सभी स्वयं पर नियंत्रण रखे तो काफी हद तक दुर्घटनाएं रुक सकती हैं. सरकार अपनी तरफ से तो काफी कुछ कर ही रही है, हमें भी सावधानी की आवश्यकता है.
>अंत में:
>सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है?
प्रिय मित्रो, बहस का जन्म, बहस के लिए ही किया गया है. देश-विदेश के मुद्दों पर ही नहीं बल्कि शहरों, कस्बों और देहातों के मुद्दों पर बहस करने के लिए. इसके अतिरिक्त और भी कई मुद्दे हैं. आशा रखता हूँ, आप सभी का सहयोग निरंतर मिलता रहेगा. आपके सहयोग से ही बहस, बहस बन पायेगी.....उम्मीद के साथ.... . आपका अपना, मनोज धीमान (मोबाइल; 9417600099)
सोमवार, 31 अक्टूबर 2011
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011
औरतों पर अत्याचार क्यों?
>यकीनन ये खबर दुरुस्त है कि इस्लामाबाद (पाकिस्तान) के पंजाब प्रांत में एक आदमी ने अपनी पत्नी की नाक और होठ सिर्फ इसलिए काट दिए क्योंकि उसने एक शादी समारोह में नृत्य करने से मना कर दिया. वेहरी कस्बे के निवासी मोहम्मद अब्बास ने पत्नी गुलशन बीबी से एक शादी समारोह में नृत्य करने के लिए कह रहा था. पीड़िता के मना करने पर अब्बास गुस्से में आ गया और उसने गुलशन की नाक और होठ काट दिए. गुलशन को गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है. पुलिस ने अब्बास को गिरफ्तार कर लिया है.
>तरक्की के इस दौर में भी ऐसी ख़बरें पढने - सुनने को मिल रही हैं, ये बेहद खेदजनक बात है. आखिर गुलशन बीबी का क्या कसूर था कि उसका चेहरा बदसूरत कर दिया गया. क्या उसका कसूर इतना था कि वह औरतजात थी. किसी भी औरत का सबसे बड़ा गहना उसका खूबसूरत चेहरा होता है, जिसे अब्बास ने अपनी बीवी (कहने भर को) से छीन लिया. अगर वास्तव में वह गुलशन बीबी को अपनी जीवन संगिनी समझता तो ऐसा कुकृत्य कभी ना करता.
>क्या किसी भी समाज में मर्दों को ही सभी हक हासिल हैं? क्या औरतों का कोई हक नहीं? क्या उनके मन में इच्छाएं नहीं होतीं? अगर गुलशन बीबी ने शादी समारोह में नृत्य करने से मना कर दिया
तो इस से कौन सा आसमान टूट पड़ा था. बात दरअसल अहम की है. आखिर एक औरत की इतनी हिम्मत कैसे हो गयी कि अपने मर्द के "आदेश" को अनदेखा कर दिया.....शायद, अब्बास ने यही सोचा होगा. बड़े अफ़सोस कि बात है कि आज भी कुछ लोग औरत को "गुलाम" से कमतर नहीं समझते. एक ऐसा "गुलाम" जिसे अपने "मालिक" का हर "हुक्म" मानना पड़ता है. बेशक "हुक्म" वाजिब हो या ना हो.
>क्या अब्बास कभी गुलशन बीबी के चेहरे की खूबसूरती को लौटा सकेगा. इस "दुर्घटना" से गुलशन बीबी के दिल में जो "गहरे घाव" पैदा हुए हैं क्या उन्हें कभी भरा जा सकता है. जवाब शायद ना में ही होगा.
>अंत में;
>औरतों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए समाज क्या भूमिका निभा सकता है?
रविवार, 23 अक्टूबर 2011
गद्दाफी की मौत पर उठ रहे सवाल?
>लीबिया के सैन्य तानाशाह कर्नल मुअम्मार गद्दाफी की हत्या को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. जी हाँ, श्रीलंका ने लीबिया के पूर्व शासक मुअम्मर गद्दाफी की हत्या की निंदा करते हुए सैन्य तानाशाह की मौत को लेकर पूरे मामले की जांच किए जाने की मांग की है. ख़बरों के मुताबिक श्रीलंका के विदेश मंत्रालय की ओर से कड़े शब्दों में जारी बयान में कहा है कि श्रीलंका की सरकार गद्दाफी की मौत से जुड़े हालात पर सफाई चाहती है. गद्दाफी की श्रीलंका से पुरानी दोस्ती रही है.
>ख़बरों में बताया गया है कि सिरते में जिस वक्त एनटीसी के लड़ाकों ने गद्दाफी को पकड़ा, उस वक्त सैन्य तानाशाह ने लड़ाकों को जान बख्शने के एवज में काफी मात्रा में धन-दौलत देने का वादा किया. हमाद मुफ्ती अली नाम के एक लड़ाके ने बताया कि गद्दाफी अपनी जान के एवज में कुछ भी देने के लिए तैयार था. उसने कहा कि उसके पास काफी सोना और धन दौलत है.
>आखिर जनता के विद्रोह ने एक तानाशाह से मुक्ति पा ही ली. गद्दाफी ने लगभग 42 वर्ष तक लीबिया पर शासन किया. इस दौरान उसने अपने देश की जनता पर कई तरह के अत्याचार किये. यहाँ तक कि उन औरतों को भी बक्शा नहीं गया जो निरंतर उसकी सुरक्षा में तैनात रहा करती थीं. उनके साथ बलात्कार तक किये गए. अपने शासन के दौरान गद्दाफी ने अपार धन -दौलत एकत्र की. लेकिन, अंतिम समय इस धन - दौलत ने उसका साथ ना दिया. उसने लड़ाकों को धन-दौलत देने का लालच दिया. लेकिन, किसी ने उसकी एक ना सुनी. अंत में, गद्दाफी का जो हश्र हुआ उसके बारे में सभी जानते ही हैं.
>हर तानाशाह का एक दिन अंत होता है. और अंत भी बहुत बुरा होता है. इतिहास खोल कर देखा जाये तो सभी तानाशाहों का गद्दाफी जैसा ही अंत होता है. जनता में जब तानाशाही के प्रति रोष उत्पन्न होता है तो तानाशाही और तानाशाह का अंत होता ही है. सत्ता में बैठा तानाशाह ये समझ बैठता है कि इस धरती पर वह इंसान नहीं, भगवान् है और शेष लोग तो कीड़े-मकौड़े भर हैं. लेकिन, गद्दाफी जैसा तानाशाह अंत में ऐसी स्थिति में होता है कि अपनी भूल सुधारने लायक तो क्या माफ़ी के काबिल भी नहीं रहता.
>गद्दाफी की मौत उन शासकों के लिए सबक है जो अपने अधीन प्रजा पर अत्याचार करते हैं. बेशक गद्दाफी के खात्मे के तरीके को लेकर जांच किए जाने की अंतरराष्ट्रीय मंच पर मांग उठ रही है. लगता नहीं कि ऐसी मांगों का अब कोई औचित्य शेष रह गया है. ऐसी मांग उठाने वाले तब कहाँ थे जब गद्दाफी की तानाशाही जारी थी और लीबिया की जनता पिस रही थी, जुल्म सह रही थी? ये जनता का गुस्सा ही था कि गद्दाफी की जान बख्शने के हक में कोई भी नहीं था. उसे गली में घूम रहे किसी आवारा कुत्ते की मौत ही मार दिया गया. ऐसी मौत जो दर्दनाक थी......बिलकुल वैसी ही, जैसे उसने भी ना जाने कितने लीबियावासियों को दी होगी.
>अंत में?
>क्या गद्दाफी के खात्मे के तरीके को लेकर जांच किए जाने की अंतरराष्ट्रीय मंच पर की जा रही मांग में अब कोई औचित्य शेष रह गया है.
रविवार, 16 अक्टूबर 2011
सुविधाओं का अभाव क्यों?
>शिमला की रोपा पंचायत के लढैर (कुई नाला) गांव से एक बेहद दर्दनाक खबर पढने को मिली है. इस खबर के मुताबिक एक गर्भवती महिला की सड़क सुविधा न होने के कारण मौत हो गई है. खबर में बताया गया है कि 21 वर्षीय रीना कुमारी को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई. सड़क की हालत बेहद खराब होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी और युवती ने दम तोड़ दिया. हालांकि महिला की नवजात बच्ची स्वस्थ है। रोपा पंचायत के प्रधान रतन चंद भारती का कहना है कि पंचायत ने कई बार प्रस्ताव भेज कर सड़क बनाने की मांग की, लेकिन अब तक सड़क नहीं बन पाई है.
>ये बेहद संगीन मामला है. ऐसी कई घटनाएँ देश के अन्य कोनों में भी घटित होती होंगी. मगर, सभी घटनाएँ मीडिया में नहीं आ पाती हैं. सवाल तो ये उठता है कि ऐसी घटनाएँ होती ही क्यों हैं. आज़ादी के बाद भी अगर ऐसी घटनाएं हो रही हैं तो यह बहुत शर्मनाक बात है. देश की जनता से तरह - तरह के कर वसूल किये जाते हैं. बदले में सुविधाएं भी जनसामान्य को उपलब्ध नहीं की जाती. इसके लिए किस की जवाबदेही है. आखिर रीना कुमारी का क्या क्या कसूर था कि उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. क्या उसका दोष यही था कि उसे एक ऐसे गाँव में रहना पड़ रहा था जहाँ सुविधाओं का अभाव था.
>होना तो ये चाहिए कि जिस भी अधिकारी ने गैरजिम्मेवाराना रवैया दिखाते हुए पंचायत के सड़क बनाने के प्रस्तावों की बार-बार अनदेखी की है, उसके के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए और सड़क का जल्द से जल्द निर्माण करना चाहिए ताकि किसी अन्य रीना को अपने जीवन का बलिदान ना देना पड़े. इस सड़क का निर्माण करके इसका नाम रीना कुमारी के नाम पर रख देना चाहिए. अब तो यही रीना कुमारी को श्रधांजलि हो सकती है.
>देश के प्रशासनिक अधिकारियों को भी अपनी जिम्मेवारी समझते हुए अपने - अपने क्षेत्रों की एक सूची तयार करनी चाहिए कि किन क्षेत्रों में सुविधायों की कमी है ताकि उन्हें ठीक किया जा सके. अधिकारी भी केवल सरकारी संसाधनों पर ही निर्भर ना रहें. उन्हें अपने तौर पर प्रयास करने चाहियें कि कॉरपोरेट सेक्टर व् अन्य दानी सज्जनों का सहयोग भी हासिल करें ताकि सुविधायों का कहीं भी अभाव ना रहे. देश में अनगिनत ऐसे लोग हैं जो खुले दिल से समाज सेवा के लिए हर पल तैयार रहते हैं.
>अंत में:
>क्या प्रशासनिक अधिकारियों को अपने क्षेत्रों में सुविधायों का अभाव दूर करने के लिए निजी तौर पर प्रयास करने चाहियें?
बुधवार, 12 अक्टूबर 2011
परेशान जनता करे भी क्या?
>घूसखोरी की आदत बहुत बुरी है. एक बार लत पड़ जाते तो फिर हटती ही नहीं. देश की जनता घूसखोरों से बेहद परेशान है. अब लोगों ने सामूहिक तौर पर घूसखोरो से दो - दो हाथ कर लेने की ठान ली है. तभी तो एक ताज़ा समाचार में बताया गया है कि मुजफ्फरपुर. जिले, बिहार, के बोचहा स्थित उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक के शाखा प्रबंधक को ग्रामीणों ने कथित तौर पर घूस लेते रंगे हाथ दबोच लिया . यह अधिकारी इंदिरा आवास के एवज में एक ग्रामीण से 22 ,500 रुपये की कथित घूस ले रहा था. ग्रामीणों ने बैंक मैनेजर के साथ-साथ उनके एक दलाल को भी पकड़ लिया. इसके बाद ग्रामीणों ने इसकी सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने बैंक मैनेजर और दलाल को गिरफ्तार कर लिया है.
>सरकारी पदों पर बैठे अधिकारी मोटी तनख्वाहें लेते हैं. इस के अतिरिक्त अन्य सुख-सुविधाएं भी उनकों हासिल होती हैं. बावजूद इसके वे लोग घूस लेने से बाज नहीं आते. एक बार भी यह नहीं सोचते कि घूस देने वाले ने कितनी मेहनत से पैसा कमाया होगा, और वे उससे बेशर्मी से घूस की रकम वसूल करके अपनी जेबों में ठूंस लेते हैं. लेकिन, घूस का लिया हुआ पैसा कभी ना कभी तो अपना असर दिखता ही है. आज नहीं तो कुछ अरसे बाद. अक्सर देखा है कि एक व्यक्ति हर नाजायज तरीके से पैसा कमाता है. अंत में एक वक़्त आता है कि उस पैसे का इस्तेमाल करने वाला ही परिवार में ओई नहीं बचता. या फिर ऐसा भी देखा है की एक व्यक्ती हर नाजायज तरीका इस्तेमाल करके जायदाद बना लेता हैं. अंत में, जायदाद खंडहर में तब्दील हो जाती है क्योंकि परिवार में कोई उसे इस्तेमाल करने वाला ही शेष नहीं रह जाता. ऐसा ही और भी बहुत कुछ घट जाता है. वैसे तो सब कुछ नियती के हाथ में ही होता है.
>उक्त मामले में अगर लोग चाहते तो पुलिस या सतकर्ता विभाग से भी मदद मांग सके थे. मगर, जनता अब सब कुछ देख चुकी है. इसीलिए, अब उसने स्वयं ही घूसखोरो से निबटने की ठान ली है. पुलिस और सम्बंधित विभागों को भी इस बात पर गौर करना चाहिए कि अब जनता उन्हें पहले सूचना क्यों नहीं देती. क्या जनता का उन पर से भरोसा उठ गया है. यह एक विचारणीय विष्य है.
>अंत में;
>क्या जनता का घूसखोरों से स्वयं ही निबटना उचित है?
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011
किस सदी में जी रहे हैं हम?
>ढाका से आयी एक खबर में बताया गया है कि शुक्रवार को साउदी अरब की राजधानी रियाद में आठ बांग्लादेशी प्रवासियोंका सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर दिया गया. इन आठ बांग्लादेशियों पर एक सिक्योरिटी गार्ड की हत्या का आरोप था. इस नृशंस कार्रवाई की बांग्लादेश सरकार और मानवाधिकार ग्रुप ने कड़े शब्दों में आलोचना की है. ह्यूमन राइट्स ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक हस्सीबा हज सहरोइ ने कहा है कि साउदी अरब में कोर्ट द्वारा की गई यह कार्रवाई निंदनीय है. उन्होंने यह भी कहा है कि अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर यदि देखें तो यह अनुचित है.
>खबर रौंगटे खड़े कर देने वाली है. यकीन करना मुश्किल है कि आज के दौर में भी ऐसी सजा सार्वजनिक रूप से दी जा रही है. तरक्की के इस दौर में एक तरफ दुनिया चाँद पर बस्तियां बसाने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाएँ हो रही हैं. क्या हम आज भी पुरातन युग में जी रहे हैं?
>किसी भी मुजरिम को सजा इस लिए दी जाती है ताकि वह भविष्य में सुधर जाये. सजा से अन्य लोगों को नसीहत भी मिलती है कि वे भी कोई गुनाह ना करें अन्यथा उन्हें भी ऐसी ही सजा भुगतनी पड़ सकती है. मगर सजा का ये अर्थ नहीं है कि मानवता को पूरी तरह से रौंद दिया जाये. किसी मुजरिम का सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने से क्या भविष्य में अपराध कम हो सकता है. ऐसा लगता तो नहीं. सजा के और भी कई ढंग हैं. अगर किसी मुजरिम को मौत की सजा ही देनी है तो उसे फांसी दी जा सकती है.
>वैसे तो ह्यूमन राइट्स ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक ने घटना कि निंदा की है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. इस मुद्दे पर सभी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार गुटों व् संस्थाओं को एकजुट हो कर आम राय बनाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इस तरह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की उल्लंघना ना हो सके.
>अंत में:
>क्या सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने जैसी सजा पर रोक लगनी चाहिए?
>खबर रौंगटे खड़े कर देने वाली है. यकीन करना मुश्किल है कि आज के दौर में भी ऐसी सजा सार्वजनिक रूप से दी जा रही है. तरक्की के इस दौर में एक तरफ दुनिया चाँद पर बस्तियां बसाने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाएँ हो रही हैं. क्या हम आज भी पुरातन युग में जी रहे हैं?
>किसी भी मुजरिम को सजा इस लिए दी जाती है ताकि वह भविष्य में सुधर जाये. सजा से अन्य लोगों को नसीहत भी मिलती है कि वे भी कोई गुनाह ना करें अन्यथा उन्हें भी ऐसी ही सजा भुगतनी पड़ सकती है. मगर सजा का ये अर्थ नहीं है कि मानवता को पूरी तरह से रौंद दिया जाये. किसी मुजरिम का सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने से क्या भविष्य में अपराध कम हो सकता है. ऐसा लगता तो नहीं. सजा के और भी कई ढंग हैं. अगर किसी मुजरिम को मौत की सजा ही देनी है तो उसे फांसी दी जा सकती है.
>वैसे तो ह्यूमन राइट्स ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक ने घटना कि निंदा की है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. इस मुद्दे पर सभी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार गुटों व् संस्थाओं को एकजुट हो कर आम राय बनाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इस तरह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की उल्लंघना ना हो सके.
>अंत में:
>क्या सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने जैसी सजा पर रोक लगनी चाहिए?
सोमवार, 10 अक्टूबर 2011
स्विस बैंक से काला धन निकाल रहे नेता?
>आज एक बड़ी अहम खबर पढने में आयी है. उकलाना, हिसार (हरियाणा), में एक जनसभा को संबोधित करते हुए टीम अन्ना की अहम सदस्य किरण बेदी ने कहा है कि स्विस बैंक के अधिकारियों ने खुलासा किया है कि भारतीय नेता स्विस बैंक से काला धन निकाल रहे हैं और दूसरों के नाम से संपत्ति खरीद रहे हैं. उन्होंने आगे कहा है कि लोकपाल कानून होता तो ये लोग जेल के अंदर होते.
अगर सच में ऐसा हो रहा है तो यह बेहद दुखद बात है. इस सम्बन्ध में भारत सरकार को जल्दी से जल्दी कोई कदम उठाना चाहिए. देश कि जनता को इतनी भी भोली-भाली ना समझा जाये कि नेता कुछ भी करते जाएँ. आखिर उनकी देश की जनता के प्रति कोई जवाबदेही बनती है.
>केंद्र की सरकार की प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है. अगर उसने अभी भी इस सम्बन्ध में कोई ठोस कार्रवाही ना की तो देश का बहुत बड़ा नुक्सान हो सकता है और देश के भ्रष्ट नेता साफ़ तोर पर बच सकते हैं. सरकार ना केवल स्विस बैंक से काला धन वापस लाने का ठोस प्रयास करे बल्कि, उन नेताओं के नामों का भी पता लगाये जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी अभियान शुरू होने के बाद काला धन निकलवाया है और दूसरों के नाम से संपत्ति खरीद रहे हैं. सरकार ऐसे भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी करे.
>अगर आज भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई ना की गए तो आने वाला वक़्त और भी खतरनाक हो सकता है जब भ्रष्टाचार की कोई सीमा शेष ना रहेगी. भ्रष्टाचार को अगर "आर्थिक आंतकवाद" का नाम दे दिया जाये तो कोई गलती ना होगी. भ्रष्ट लोगों के कारण आज देश में जितना विकास होना चाहिए था उतना हो नहीं रहा. विकास के नाम पर जो धन सरकारों द्वारा जारी किया जाता है, बीच रास्ते में ही उसका एक बड़ा हिस्सा खुर्द-बुर्द कर दिया जाता है. सरकारी टेंडर जारी करने में ही भ्रष्टाचार हो जाता है. मतलब कि हर कदम पर भ्रष्टाचार अपने पाँव पसारे बैठा है.
>अंत में:
>स्विस बैंक के अधिकारियों के खुलासे के बाद कि भारतीय नेता स्विस बैंक से काला धन निकाल रहे हैं, सरकार को क्या कार्रवाई तुरंत करनी चाहिए?
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