कितनी हैरानकुन बात है की जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को कहा कि संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से राज्य में आतंकवादी हमले दोबारा शुरू हो सकते हैं जिसे लेकर वह चिंतित हैं. उनका कहना है कि जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के नेता मुहम्मद मकबूल भट्ट को वर्ष 1984 में फांसी की सजा देने के बाद कश्मीर में आतंकवादियों की एक फौज तैयार हो गई थी. उन्हें चिंता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक फिर बढ़ जाएंगी जो इस समय काफी कम हैं. उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वह अफजल गुरु को मृत्युदंड दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं.
आखिर इस वक्तव्य का क्या मतलब है. क्या उमर अब्दुल्ला अपनी कमजोरी को छुपाना चाहते हैं या फिर इस वक्तव्य के पीछे कोई और बात है. उन्हें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं. अगर उन जैसे लोग ही मीडिया में इस तरह के वक्तव्य देंगे तो जनता में क्या सन्देश जाएगा. उनका द्वारा दिया गया ब्यान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. आंतकवाद कि समस्या को सख्ती से ही निबटा जा सकता है, प्यार से नहीं. पंजाब में भी आंतकवाद पैदा हुआ था. लेकिन, उसे सख्ती व् होशियारी से ख़त्म किया गया. ना तो सुरक्षा कर्मिओं ने और ना ही राज्य के नेताओं ने आंतकवाद के आगे अपने घुटने टेके. अगर किसी नेता ने राज्य या देश पर शासन करना है तो उसे दृढ़ता तो दिखानी ही पड़ेगी. सबसे पहले उसे देश के बारे में सोचना पडेगा. अन्यथा इसका भारी खामियाजा भुगतना पडेगा.
अगर उमर अब्दुल्ला को लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक बार फिर बढ़ जाएंगी तो उन्हें किस ने कहा है कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहें. वे जब चाहे इस्तीफ़ा दे सकते हैं. शायद जम्मू एवं कश्मीर को उनसे बेहतर मुख्यमंत्री मिल जाये.
अंत में;
क्या आपको लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं बढ़ जाएंगी?
प्रिय मित्रो, बहस का जन्म, बहस के लिए ही किया गया है. देश-विदेश के मुद्दों पर ही नहीं बल्कि शहरों, कस्बों और देहातों के मुद्दों पर बहस करने के लिए. इसके अतिरिक्त और भी कई मुद्दे हैं. आशा रखता हूँ, आप सभी का सहयोग निरंतर मिलता रहेगा. आपके सहयोग से ही बहस, बहस बन पायेगी.....उम्मीद के साथ.... . आपका अपना, मनोज धीमान (मोबाइल; 9417600099)
गुरुवार, 29 सितंबर 2011
बुधवार, 28 सितंबर 2011
संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति क्यों?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बुधवार को संसद हमले के दोषी अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो सकी. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस विधायकों के बीच झड़पों के कारण सदन की कार्यवाही कल तक स्थगित कर दी गई.
लेकिन, विचारयोग्य बात तो ये है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का प्रस्ताव विधानसभा में रखा ही क्यों गया. अफजल गुरु को पहले ही सजा सुनायी जा चुकी है. उस पर एक संगीन जुर्म सिद्ध हो चूका है. ख़बरों के मुताबिक भाजपा ने अफजल की दया याचिका से सम्बंधित प्रस्ताव पर भी जमकर हंगामा किया और ‘राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव वापस करो, वापस करो’ के नारे लगाए।
भाजपा का ये कदम शायद गलत भी नहीं है. अगर उसने अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव करार दिया है तो इस में गलत भी क्या है. ऐसा प्रस्ताव लाने वाले ये मत भूलें कि वे भी भारत में रहते हैं. उन्हें ये बात नहीं भूल जानी चाहिए कि अफजल गुरु संसद पर हमले का दोषी है. संसद पर हमला यानी देश पर हमला. क्या कोई भी नागरिक इस बात को स्वीकार कर लेगा कि ऐसे खतरनाक मुजरिम को दया दे देनी चाहिए?
वैसे भी कानून को अपना कार्य करने देना चाहिए. हर बात में राजनीति करना अच्छी बात नहीं. संवेदनशील मुद्दों पर तो वैसे भी राजनीति करने से परहेज करना चाहिए. अगर आंतकवादियों के प्रति दया दिखाई जाती रही तो उनके हौंसले बुलंद ही होंगे, कमजोर नहीं. ऐसे मामलों में तो ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि अन्य आंतकवादियों को भी सबक मिले.
देश में राजनीति करने नेताओं को चाहिए कि वे अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या उन्हें संवेदनशील मामलों पर राजनीति करनी चाहिए.
अंत में;
क्या संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति की इजाजत होनी चाहिए?
लेकिन, विचारयोग्य बात तो ये है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का प्रस्ताव विधानसभा में रखा ही क्यों गया. अफजल गुरु को पहले ही सजा सुनायी जा चुकी है. उस पर एक संगीन जुर्म सिद्ध हो चूका है. ख़बरों के मुताबिक भाजपा ने अफजल की दया याचिका से सम्बंधित प्रस्ताव पर भी जमकर हंगामा किया और ‘राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव वापस करो, वापस करो’ के नारे लगाए।
भाजपा का ये कदम शायद गलत भी नहीं है. अगर उसने अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव करार दिया है तो इस में गलत भी क्या है. ऐसा प्रस्ताव लाने वाले ये मत भूलें कि वे भी भारत में रहते हैं. उन्हें ये बात नहीं भूल जानी चाहिए कि अफजल गुरु संसद पर हमले का दोषी है. संसद पर हमला यानी देश पर हमला. क्या कोई भी नागरिक इस बात को स्वीकार कर लेगा कि ऐसे खतरनाक मुजरिम को दया दे देनी चाहिए?
वैसे भी कानून को अपना कार्य करने देना चाहिए. हर बात में राजनीति करना अच्छी बात नहीं. संवेदनशील मुद्दों पर तो वैसे भी राजनीति करने से परहेज करना चाहिए. अगर आंतकवादियों के प्रति दया दिखाई जाती रही तो उनके हौंसले बुलंद ही होंगे, कमजोर नहीं. ऐसे मामलों में तो ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि अन्य आंतकवादियों को भी सबक मिले.
देश में राजनीति करने नेताओं को चाहिए कि वे अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या उन्हें संवेदनशील मामलों पर राजनीति करनी चाहिए.
अंत में;
क्या संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति की इजाजत होनी चाहिए?
सोमवार, 26 सितंबर 2011
कब आयेगी सामाजिक समानता ?
लुधिआना, पंजाब, के जाने - मान चार्टड अकाउंटेंट राजीव के. शर्मा ने एक सन्देश भेज कर बेहद गंभीर मुद्दा उठाया है. उनका मत है कि वतन के लिए शहादत देने वालों के सपने तब तक मुकम्मल नहीं होंगे जब तक कि देश में सामाजिक समानता नहीं आती. इस बात में रत्ती भर भी शक की गुंजाइश नहीं है. आज देश की क्या स्थिति है, इस के बारे में हम सब जानते ही हैं.
अमीर और गरीब में फासला निरंतर बर्धता जा रहा है. जब से डेस्क में व्यवसायिक गतिविधिओं का प्रचलन बढ़ा है, हालत और भी गंभीर हो गई हैं. अमीरों के लिए माल्स खुल गए है. उनके लिए वातानुकूलित ट्रेनें चल पडी हैं. ना जाने क्या क्या सुख सुविधाएं पैदा हो चुकी हैं. दूसरी और आज भी गरीबों को भरपेट भोजन नहीं मिलता, रहने को छत नसीब नहीं होती और पहनने को ढंग के कपडे नहीं मिलते. ट्रेनों के डिब्बों पर नजर डाली जाये तो उनमें आम आदमी माल गोदाम की तरह भरा हुआ मिलता है.
देश को 1947 में आजादी प्राप्त हुई थी. इतने बरसों बाद भी देश में सामाजिक समानता दिखाई क्यों नहीं देती. इस के लिए कौन लोग जिम्मेवार हैं. देश के नेता तो हैं ही. हब सब भी इस के लिए जिम्मेवार हैं. हम सब में भी जागरूकता की कमी दिखाई देती है. हमें भी अपना कर्तव्य समझ कर कुछ ना कुछ अवश्य करना चाहिए. किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा दिलवाने में मदद कर देनी चाहिए. गरीब का बच्चा एक बार अपने पाँव पर खड़ा हो गया तो उसकी आने वाली नस्लें सुधर जाएँगी. देश सुधर जाएगा. अमीरों को चाहिए कि किसी किस्म का दिखावा ना कारें. अफ़सोस तो इस बात का है कि अमीर दिखावा करके अपने को सबसे महान सिद्ध करना चाहता है. तभी तो बहुमंजिला महल खड़े करके सड़कों पर रहने वाले गरीबों का मजाक उडाता है.
अंत में:
सामाजिक समानता लाने में आम नागरिक की क्या भूमिका हो?
अमीर और गरीब में फासला निरंतर बर्धता जा रहा है. जब से डेस्क में व्यवसायिक गतिविधिओं का प्रचलन बढ़ा है, हालत और भी गंभीर हो गई हैं. अमीरों के लिए माल्स खुल गए है. उनके लिए वातानुकूलित ट्रेनें चल पडी हैं. ना जाने क्या क्या सुख सुविधाएं पैदा हो चुकी हैं. दूसरी और आज भी गरीबों को भरपेट भोजन नहीं मिलता, रहने को छत नसीब नहीं होती और पहनने को ढंग के कपडे नहीं मिलते. ट्रेनों के डिब्बों पर नजर डाली जाये तो उनमें आम आदमी माल गोदाम की तरह भरा हुआ मिलता है.
देश को 1947 में आजादी प्राप्त हुई थी. इतने बरसों बाद भी देश में सामाजिक समानता दिखाई क्यों नहीं देती. इस के लिए कौन लोग जिम्मेवार हैं. देश के नेता तो हैं ही. हब सब भी इस के लिए जिम्मेवार हैं. हम सब में भी जागरूकता की कमी दिखाई देती है. हमें भी अपना कर्तव्य समझ कर कुछ ना कुछ अवश्य करना चाहिए. किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा दिलवाने में मदद कर देनी चाहिए. गरीब का बच्चा एक बार अपने पाँव पर खड़ा हो गया तो उसकी आने वाली नस्लें सुधर जाएँगी. देश सुधर जाएगा. अमीरों को चाहिए कि किसी किस्म का दिखावा ना कारें. अफ़सोस तो इस बात का है कि अमीर दिखावा करके अपने को सबसे महान सिद्ध करना चाहता है. तभी तो बहुमंजिला महल खड़े करके सड़कों पर रहने वाले गरीबों का मजाक उडाता है.
अंत में:
सामाजिक समानता लाने में आम नागरिक की क्या भूमिका हो?
शनिवार, 24 सितंबर 2011
जाली नोटों का धंधा?
बिहार के जहानाबाद जिले के मखदुमपुर थाना क्षेत्र में पुलिस ने शनिवार को एक होटल पर छापामार कर 75,000 रुपए के जाली नोट बरामद किये. खबर के मुताबिक इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. इस तरह की खबर कोई नयी बात नहीं है. मीडिया में अक्सर ऐसी खबर पढने या सुनने को मिल ही जाती है. देश का शायद ही कोई ऐसा कोना हो जहाँ लोग इस समस्या का सामना ना कर रहे हों.
जाली करंसी का चलन देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक है. ऐसी भी खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं कि बैंक के ऐ. टी .एम् . से भी जाली करंसी निकल आती है. शामत बेचारे आम आदमी की आ जाती है जो मेहनत से कमाई करता है मगर उसके नसीब में जाती नोट आ जाता है.
आखिर किसी भी व्यक्ती की इतनी हिम्मत क्यों हो कि वह जाली नोट तैयार कर सके. सरकार को इस सम्बन्ध में उचित कदम उठाने की जरूरत है. सरकार को ऐसी करंसी तैयार करनी चाहिय कि कोई जाली करंसी बना ही ना सके. सरकार को सख्त से सख्त कानून बनाना चाहिए जिस से जाली करंसी बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके.
जाली करंसी चलने से नुक्सान तो आम व्यक्ती का भी होता है. मान लीजिये, एक व्यक्ती बैंक में अपनी मेहनत की कमाई जमा करवाने गया है. वहां जा कर उसे मालूम पड़ता है कि 500 रूपए का एक नोट जाली है. बैंक कर्मचारी तुरंत उस नोट को ना चलनेयोग्य करने हेतु उसपर पेन से उल्टी - सीधी लाईने खींच देता है. बेचारा आम आदमी रोता हुआ बैंक से बाहर आता है. सरकार को इस समस्या का हल भी ढूंढना चाहिए. आखिर उसका काम जनता की सेवा करना ही तो है. जो मुजरिम हैं उनके साथ मुजरिमों जैसा व्यवहार ही किया जाये.
अंत में:
सरकार को जाली करंसी के विरुद्ध किस तरह के कदम उठाने चाहियें?
जाली करंसी का चलन देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक है. ऐसी भी खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं कि बैंक के ऐ. टी .एम् . से भी जाली करंसी निकल आती है. शामत बेचारे आम आदमी की आ जाती है जो मेहनत से कमाई करता है मगर उसके नसीब में जाती नोट आ जाता है.
आखिर किसी भी व्यक्ती की इतनी हिम्मत क्यों हो कि वह जाली नोट तैयार कर सके. सरकार को इस सम्बन्ध में उचित कदम उठाने की जरूरत है. सरकार को ऐसी करंसी तैयार करनी चाहिय कि कोई जाली करंसी बना ही ना सके. सरकार को सख्त से सख्त कानून बनाना चाहिए जिस से जाली करंसी बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके.
जाली करंसी चलने से नुक्सान तो आम व्यक्ती का भी होता है. मान लीजिये, एक व्यक्ती बैंक में अपनी मेहनत की कमाई जमा करवाने गया है. वहां जा कर उसे मालूम पड़ता है कि 500 रूपए का एक नोट जाली है. बैंक कर्मचारी तुरंत उस नोट को ना चलनेयोग्य करने हेतु उसपर पेन से उल्टी - सीधी लाईने खींच देता है. बेचारा आम आदमी रोता हुआ बैंक से बाहर आता है. सरकार को इस समस्या का हल भी ढूंढना चाहिए. आखिर उसका काम जनता की सेवा करना ही तो है. जो मुजरिम हैं उनके साथ मुजरिमों जैसा व्यवहार ही किया जाये.
अंत में:
सरकार को जाली करंसी के विरुद्ध किस तरह के कदम उठाने चाहियें?
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
विदेश यात्राएं किस लिए?
अक्सर देखने में आया है कि सत्ता में आने के बाद मंत्री महोदय धडाधड विदेश यात्राएं करते हैं. यात्रा करना जरूरी हो चाहे ना हो, वे यात्रा अवश्य करते हैं. दरअसल, उन्हें विदेशी धरती और विदेशी लोगों का मोह हो चूका है. अपनी इन यात्राओं पर मंत्री महोदय करोड़ों रुपये खर्च कर डालते हैं. देश के ये मंत्री महोदय एक बार भी ये नहीं सोचते कि जिस पैसे पर वे लोग विदेश घूमने जा रहे हैं वह इस देश की सौ करोड़ जनता का ही है.
आज ही एक खबर में बताया गया है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पांच सालों में विदेश यात्राओं पर 2 करोड़ 4 लाख 36 हजार 825 रुपए खर्च किए. यह आंकडे जुलाई 2006 से जुलाई 2011 के बीच के हैं इस दौरान मोंटेक ने 16 बार सरकारी खर्चे पर 35 विदेश यात्राएं की. आरटीआई के तहत मांगी एक जानकारी के मुताबिक अहलूवालिया ने इसमें से केवल एक बार अपनी जेब से विदेश यात्रा का खर्च चुकाया. इस जानकारी के मुताबिक मोटंके ने पिछले पांच साल के दौरान 16 बार अमेरिका की सरकारी यात्रा की चार बार ब्रिटेन और चार बार सिंगापुर की यात्रा की. इसके अलावा अहलूवालिया दो-दो बार चीन और फ्रांस की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर की. यही नहीं स्विटजरलैंड, सऊदी अरब, कनाडा, ओमान, बहरीन कोरिया और जापान की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर निपटा डाली.
यह तो केवल एक उदाहरण है. अगर सरकार के एक-एक मंत्री का हिसाब-किताब किया जाए तो विदेश यात्राओं पर होने वाले खर्च का आंकड़ा अरबों में चला जाएगा. सरकार अगर चाहे तो इन यात्राओं पर अच्छे से लगाम लगा सकती है. केवल उन्हीं यात्राओं की इजाजत दी जाए जिन के बिना गुजरा संभव नहीं है. इस से एक बड़ी रकम बच सकती है, जिस से कई सरकारी योजनाओं को मुकम्मल किया जा सकता है. वैसे भी आजकल आईटी का जमाना है. क्यों नहीं विडियो कांफेरेंसस का सहारा लिया जाता?
एक बात और. अब जब कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने की बात की जा रही है तो क्यों ना मंत्रिओं के विदेशी दौरों संबंधी मुकम्मल जानकारी सम्बंधित मंत्रालयों की वेबसाइट पर डाली जाए ताकि देश कि जनता को भी मालूम हो सके कि यात्रा का उद्देश्य क्या था, उस पर कितना खर्चा हुआ और उससे हासिल क्या हुआ.
अंत में:
क्या मंत्रिओं की यात्राओं का मुकम्मल हिसाब-किताब सार्वजानिक किया जाना चाहिए?
आज ही एक खबर में बताया गया है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पांच सालों में विदेश यात्राओं पर 2 करोड़ 4 लाख 36 हजार 825 रुपए खर्च किए. यह आंकडे जुलाई 2006 से जुलाई 2011 के बीच के हैं इस दौरान मोंटेक ने 16 बार सरकारी खर्चे पर 35 विदेश यात्राएं की. आरटीआई के तहत मांगी एक जानकारी के मुताबिक अहलूवालिया ने इसमें से केवल एक बार अपनी जेब से विदेश यात्रा का खर्च चुकाया. इस जानकारी के मुताबिक मोटंके ने पिछले पांच साल के दौरान 16 बार अमेरिका की सरकारी यात्रा की चार बार ब्रिटेन और चार बार सिंगापुर की यात्रा की. इसके अलावा अहलूवालिया दो-दो बार चीन और फ्रांस की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर की. यही नहीं स्विटजरलैंड, सऊदी अरब, कनाडा, ओमान, बहरीन कोरिया और जापान की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर निपटा डाली.
यह तो केवल एक उदाहरण है. अगर सरकार के एक-एक मंत्री का हिसाब-किताब किया जाए तो विदेश यात्राओं पर होने वाले खर्च का आंकड़ा अरबों में चला जाएगा. सरकार अगर चाहे तो इन यात्राओं पर अच्छे से लगाम लगा सकती है. केवल उन्हीं यात्राओं की इजाजत दी जाए जिन के बिना गुजरा संभव नहीं है. इस से एक बड़ी रकम बच सकती है, जिस से कई सरकारी योजनाओं को मुकम्मल किया जा सकता है. वैसे भी आजकल आईटी का जमाना है. क्यों नहीं विडियो कांफेरेंसस का सहारा लिया जाता?
एक बात और. अब जब कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने की बात की जा रही है तो क्यों ना मंत्रिओं के विदेशी दौरों संबंधी मुकम्मल जानकारी सम्बंधित मंत्रालयों की वेबसाइट पर डाली जाए ताकि देश कि जनता को भी मालूम हो सके कि यात्रा का उद्देश्य क्या था, उस पर कितना खर्चा हुआ और उससे हासिल क्या हुआ.
अंत में:
क्या मंत्रिओं की यात्राओं का मुकम्मल हिसाब-किताब सार्वजानिक किया जाना चाहिए?
गुरुवार, 22 सितंबर 2011
आखिर किस पर विश्वास करें?
जी हाँ. आज देश के लगभग हर नागरिक के मन में यही प्रश्न घूम रहा है. आखिर विश्वास किया जाये तो किस पर किया जाये. देश के जो नेता शराफत से ओत-प्रोत लगते हैं वे भी अब घोटालों की दलदल में फंसे हुए दिख रहे हैं.
और तो और, अब पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम का नाम शामिल हो गया है. आरटीआई के जरिए सामने आई वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे. लेकिन उन्होंने 30 जनवरी, 2008 को ए राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी. उन्होंने कहा- मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू शेयरिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता। यह चिट्ठी 25 मार्च, 2011 को लिखी गई थी. चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी. 11 पन्नों की ये चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदंबरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्टी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है.
अब कहने या सोचने की और कोई जरूरत नहीं है.
जिस तरह से बड़े - बड़े नेताओं का नाम घोटालों में शामिल होता जा रहा है, देश की जनता में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है. जनता इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर वह करे भी तो क्या करे. चुनाव में किस को वोट डाले, और डाले भी तो क्यों? जनता को मजबूरी में वोट तो डालनी ही पड़ती है. आखिर सरकार का गठन भी तो करना होता है, जिस ने देश की जनता पर शासन करना होता है. सिर्फ शासन. बदले में देश की जनता को महंगाई तोहफे में मिलती है. और बड़े-बड़े घोटाले किये जाते हैं.नेताओं द्वारा जनता सोचने पर मजबूर है कि क्या सरकार में बैठे नेताओं को मात्र घोटालों के लिए ही चुन कर भेजा गया है? देश के प्रति उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं? आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा.
बेशक अन्ना टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. आशा है, वह सुबह जरूर आयेगी जब देश के हर नेता की जनता के सामने मुकम्मल जवाबदेही होगी.
न्यायसंगत बात तो यह होनी चाहिए कि घोटालों में शामिल नेताओं से सारी रकम वापस वसूली जाये. साथ ही ऐसे नेताओं को हमेशा के लिए चुनाव में खड़े से वर्जित किया जाये . जनता को भी चहिये कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार होना चाहिए.
अंत में:
भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के साथ कैसा व्यवहार होने चाहिए?
और तो और, अब पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम का नाम शामिल हो गया है. आरटीआई के जरिए सामने आई वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे. लेकिन उन्होंने 30 जनवरी, 2008 को ए राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी. उन्होंने कहा- मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू शेयरिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता। यह चिट्ठी 25 मार्च, 2011 को लिखी गई थी. चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी. 11 पन्नों की ये चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदंबरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्टी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है.
अब कहने या सोचने की और कोई जरूरत नहीं है.
जिस तरह से बड़े - बड़े नेताओं का नाम घोटालों में शामिल होता जा रहा है, देश की जनता में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है. जनता इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर वह करे भी तो क्या करे. चुनाव में किस को वोट डाले, और डाले भी तो क्यों? जनता को मजबूरी में वोट तो डालनी ही पड़ती है. आखिर सरकार का गठन भी तो करना होता है, जिस ने देश की जनता पर शासन करना होता है. सिर्फ शासन. बदले में देश की जनता को महंगाई तोहफे में मिलती है. और बड़े-बड़े घोटाले किये जाते हैं.नेताओं द्वारा जनता सोचने पर मजबूर है कि क्या सरकार में बैठे नेताओं को मात्र घोटालों के लिए ही चुन कर भेजा गया है? देश के प्रति उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं? आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा.
बेशक अन्ना टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. आशा है, वह सुबह जरूर आयेगी जब देश के हर नेता की जनता के सामने मुकम्मल जवाबदेही होगी.
न्यायसंगत बात तो यह होनी चाहिए कि घोटालों में शामिल नेताओं से सारी रकम वापस वसूली जाये. साथ ही ऐसे नेताओं को हमेशा के लिए चुनाव में खड़े से वर्जित किया जाये . जनता को भी चहिये कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार होना चाहिए.
अंत में:
भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के साथ कैसा व्यवहार होने चाहिए?
बुधवार, 21 सितंबर 2011
आखिर कब तक?
जम्मू के सांबा सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सीमा की बैनगलाड़ पोस्ट पर मंगलवार ढाई बजे पाकिस्तान की ओर से फायरिंग की गई। पाकिस्तान की चिमनी गलाड़ और गलाड़ टांडा पोस्ट से हुई इस फायरिंग में बीएसएफ की 59 बटालियन के सब इंस्पेक्टर राम चंद्र राणा शहीद हो गए. राम चंद्र राणा कालोनी आजादपुर जिला देहरादून, उत्तराखंड के रहने वाले थे । बेहद खेदपूर्ण बात है कि
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर इस तरह की घटनाएँ हो रहीं हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. ख़बरों के मुताबिक सांबा सेक्टर में पाक की ओर से एक सप्ताह में दूसरी बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया है.
विचारयोग्य बात ये है कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा. कब तक इस तरह देश के सिपाही शहीद होते रहेंगे. ऐसी घटनाओं पर देश के बड़े नेता खामोश क्यों हो जाते हैं. ऐसी घटनाओं की सार्वजानिक तौर पर निंदा क्यों नहीं करते. क्यों नहीं कहते कि संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मामला उठाया जाएगा. क्या देश के नेताओं के लिए सीमा पर होने वाली ऐसी घटनायें कोई मायने नहीं रखतीं?
सच तो ये है कि देश के नेताओं को एक दूसरे पर टीका-टिपण्णी करने से ही फुर्सत नहीं है. फुर्सत होगी तभी तो नेता लोग अन्य मुद्दों के बारे में सोच सकेंगे.
अंत में:
संघर्ष विराम का बार-बार उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के विरुद्ध क्या रणनीति होनी चाहिए?
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर इस तरह की घटनाएँ हो रहीं हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. ख़बरों के मुताबिक सांबा सेक्टर में पाक की ओर से एक सप्ताह में दूसरी बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया है.
विचारयोग्य बात ये है कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा. कब तक इस तरह देश के सिपाही शहीद होते रहेंगे. ऐसी घटनाओं पर देश के बड़े नेता खामोश क्यों हो जाते हैं. ऐसी घटनाओं की सार्वजानिक तौर पर निंदा क्यों नहीं करते. क्यों नहीं कहते कि संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मामला उठाया जाएगा. क्या देश के नेताओं के लिए सीमा पर होने वाली ऐसी घटनायें कोई मायने नहीं रखतीं?
सच तो ये है कि देश के नेताओं को एक दूसरे पर टीका-टिपण्णी करने से ही फुर्सत नहीं है. फुर्सत होगी तभी तो नेता लोग अन्य मुद्दों के बारे में सोच सकेंगे.
अंत में:
संघर्ष विराम का बार-बार उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के विरुद्ध क्या रणनीति होनी चाहिए?
सदस्यता लें
संदेश (Atom)