>मध्य प्रदेश राज्य के ग्वालियर/भोपाल से सामने एक समाचार के मुताबिक नगर निगम द्वारा आयोजित एक शिलान्यास समारोह में मंच पर बैठने को लेकर हुए विवाद के बाद भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच जमकर पथराव हुआ. दोनों पक्षों के 35 कार्यकर्ता घायल हो गए, जिनमें से 6 की हालत गंभीर बताई गई है. ऐसे समाचार किसी भी चिंतनशील नागरिक को सोचने पर विवश कर देते हैं कि क्या यही राजनीति है. अगर यही राजनीति है तो खेदजनक है. आखिर ऐसे नेता व् कार्यकर्ता किस तरह की राजनीति कर रहे हैं और किन लोगों की खातिर राजनीति कर रहे हैं.
>अब ये कोई लुकी-छिपी बात नहीं रही कि अधिकतर राजनेताओं व् कार्यकर्तायों का चरित्र गिर चुका है. सत्ता प्राप्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं. ऐसे राजनीतिज्ञों से आम जनता क्या उम्मीद रख सकती है. अब लोग राजनीति में सेवा भावना के साथ नहीं आते. राजनीति में आने का मुख्या कारण सत्ता प्राप्ति व् धन का लालच है. सत्ता में आकर राजनीतिज्ञ क्या कुछ नहीं करते इस की ताज़ा मिसाल राजस्थान का चर्चित भंवरी काण्ड है.
>अगर राजनितिक पार्टियों के नेता व् कार्यकर्ता छोटी-छोटी बात पर हिंसा पर उतारू हो जायेंगे तो आम जनता का क्या होगा?
>आज देश में इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य किसी भी अन्य पेशे में प्रैक्टिस के लिए डिग्री लेना जरूरी है. लेकिन, राजनीति में ऐसा नहीं है. भला ऐसा क्यों हो रहा है? होना तो ये चाहिए कि सभी राजनितिक पदों के लिए न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए. राजनीति में काम करने लिए अधिकतम आयु सीमा होनी चाहिए. आज ऐसा नहीं है. राजनीति में कई ऐसे लोग हैं जो शिक्षित नहीं हैं. कब्र में पाँव होने के बावजूद सत्ता का मोह नहीं छोड़ते. इसी वजह से आज देश की हालत बाद से बदतर होती जा रही है. जिस व्यक्ति ने दस जमातें भी पास नहीं की होतीं, राजनीति में आकर आई.ए.एस/ आई.पी.एस. अधिकारियों पर शासन करता हैं. अधिकारीयों को जायज व् नाजायज काम करने के लिए मजबूर करता है. अगर कोई अधिकारी नेता के विरुद्ध कुछ कहने का दुस्साहस दिखता है तो उसे दिमागी तौर पर बीमार करार दे दिया जाता है.
>अंत में?
>क्या राजनितिक पदों के लिए न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए? साथ ही क्या राजनीति में अधिकतम आयु सीमा होनी चाहिए?
प्रिय मित्रो, बहस का जन्म, बहस के लिए ही किया गया है. देश-विदेश के मुद्दों पर ही नहीं बल्कि शहरों, कस्बों और देहातों के मुद्दों पर बहस करने के लिए. इसके अतिरिक्त और भी कई मुद्दे हैं. आशा रखता हूँ, आप सभी का सहयोग निरंतर मिलता रहेगा. आपके सहयोग से ही बहस, बहस बन पायेगी.....उम्मीद के साथ.... . आपका अपना, मनोज धीमान (मोबाइल; 9417600099)
शनिवार, 12 नवंबर 2011
शुक्रवार, 4 नवंबर 2011
योग का चमत्कार?
>इस में कोई दो राय नहीं की योग में बहुत शक्ति है. योग एक चमत्कार है. योग की शिक्षा देने वाले इस देश में पहले भी हुए हैं. लेकिन, योग का प्रचार-प्रसार आज के युग में जितना बाबा रामदेव ने किया है, उतना शायद ही किसी और ने किया होगा. उन्होंने योग को घर-घर में पहुंचा दिया है.
>इन दिनों बाबा रामदेव पंजाब के दौरे पर हैं. शुक्रवार को योग गुरु ने पंजाब के मोगा में भारतीय कबड्डी टीम के खिलाड़ियों के साथ कबड्डी खेल कर सभी को हैरान-परेशान कर दिया. लगभग दस मिनट तक उन्होंने खिलाड़ियों को जमकर छकाया. इस अंतराल में एक भी खिलाड़ी उन्हें छू तक नहीं पाया. दूसरी ओर उन्होंने "कबड्डी-कबड्डी" कहते हुए चारों खिलाड़ियों को मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया। खिलाड़ियों के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके दम का राज योग ही है. उन्होंने बताया कि कबड्डी सांस को साधने का खेल है और लगातार कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम के साथ योग करते रहने से सांस को बेहतर ढंग से साधा जा सकता है.
>यहाँ जिक्रयोग्य है कि इन दिनों पंजाब में मोगा के ढुढीके में विश्व कबड्डी कप का आयोजन चल रहा है.
>जो कुछ बाबा रामदेव कर रहे हैं, उसे नकारा नहीं जा सकता. कुछ लोग उनकी ऐसी हरकतों को नाटकबाजी भी कह सकते हैं ताकि मीडिया में बनें रहें. लेकिन, उनकी बातों से बहुत से लोग प्रभावित भी हो रहे हैं. इसी प्रभाव के चलते सुबह जल्दी बिस्तर से उठने लगे हैं, नियमित तौर पर कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम करने लगे हैं. यहाँ तक कि अपना खान-पान भी बदलने लगे हैं. जो काम आज ताज देश की सरकारें नहीं कर सकीं, वह बाबा रामदेव कर रहे हैं. अगर बाबा रामदेव देश की जनता को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक करने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं तो देश के नेता और सरकारें उन्हें कब तक नज़रअंदाज कर सकती हैं.
>देश व् राज्य की सरकारों को भी चाहिए कि वे योग को भी स्कूलों और कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करे. योग को केवल पाठ्यक्रम में शामिल ही ना किया जाये बल्कि अहम विषय के तौर पर शामिल किया जाये. जब युवाओं का मन और तन स्वस्थ होगा तो वे अवश्य ही अच्छे नागरिक बनेंगे. इससे लोगों में अपराधिक प्रवृति भी कम होगी. साथ ही उनकी विचार शक्ति भी मजबूत और सकारात्मक होगी. देश में योग पर खोज केंद्र भी स्थापित किये जा सकते हैं. योग के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. जरूरत है तो बस इन संभावनाओं को कैश कर लेने की.
>अंत में;
>देश में योग को प्रफुल्लित करने के लिए केंद्र व् राज्य सरकारों की क्या जिम्मेवारी बनती है?
>इन दिनों बाबा रामदेव पंजाब के दौरे पर हैं. शुक्रवार को योग गुरु ने पंजाब के मोगा में भारतीय कबड्डी टीम के खिलाड़ियों के साथ कबड्डी खेल कर सभी को हैरान-परेशान कर दिया. लगभग दस मिनट तक उन्होंने खिलाड़ियों को जमकर छकाया. इस अंतराल में एक भी खिलाड़ी उन्हें छू तक नहीं पाया. दूसरी ओर उन्होंने "कबड्डी-कबड्डी" कहते हुए चारों खिलाड़ियों को मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया। खिलाड़ियों के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके दम का राज योग ही है. उन्होंने बताया कि कबड्डी सांस को साधने का खेल है और लगातार कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम के साथ योग करते रहने से सांस को बेहतर ढंग से साधा जा सकता है.
>यहाँ जिक्रयोग्य है कि इन दिनों पंजाब में मोगा के ढुढीके में विश्व कबड्डी कप का आयोजन चल रहा है.
>जो कुछ बाबा रामदेव कर रहे हैं, उसे नकारा नहीं जा सकता. कुछ लोग उनकी ऐसी हरकतों को नाटकबाजी भी कह सकते हैं ताकि मीडिया में बनें रहें. लेकिन, उनकी बातों से बहुत से लोग प्रभावित भी हो रहे हैं. इसी प्रभाव के चलते सुबह जल्दी बिस्तर से उठने लगे हैं, नियमित तौर पर कपाल भाती, अनुलोम विलोम व् अन्य प्राणायाम करने लगे हैं. यहाँ तक कि अपना खान-पान भी बदलने लगे हैं. जो काम आज ताज देश की सरकारें नहीं कर सकीं, वह बाबा रामदेव कर रहे हैं. अगर बाबा रामदेव देश की जनता को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक करने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं तो देश के नेता और सरकारें उन्हें कब तक नज़रअंदाज कर सकती हैं.
>देश व् राज्य की सरकारों को भी चाहिए कि वे योग को भी स्कूलों और कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करे. योग को केवल पाठ्यक्रम में शामिल ही ना किया जाये बल्कि अहम विषय के तौर पर शामिल किया जाये. जब युवाओं का मन और तन स्वस्थ होगा तो वे अवश्य ही अच्छे नागरिक बनेंगे. इससे लोगों में अपराधिक प्रवृति भी कम होगी. साथ ही उनकी विचार शक्ति भी मजबूत और सकारात्मक होगी. देश में योग पर खोज केंद्र भी स्थापित किये जा सकते हैं. योग के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. जरूरत है तो बस इन संभावनाओं को कैश कर लेने की.
>अंत में;
>देश में योग को प्रफुल्लित करने के लिए केंद्र व् राज्य सरकारों की क्या जिम्मेवारी बनती है?
बुधवार, 2 नवंबर 2011
अगर ऐसा हो जाये?
>एक अच्छी खबर है कि पंजाब की लवली प्रोफैशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) के कम्युनिटी सर्विस सेल द्वारा दस एनएसएस यूनिट्स का गठन किया गया. इन यूनिट्स के अंतर्गत 2 ,000 से अधिक छात्रों ने स्वेच्छापूर्वक स्वयं को रजिस्टर्ड करवाया है. हर स्वयंसेवक दो वर्षों में 240 घंटे सामुदायिक कार्यों को देंगे. अंततः छात्रों में अनुशासन पैदा होगा और उनका बेहतर चरित्र निर्माण होगा. इसके अतिरिक्त छात्रों का स्वस्थ्य बेहतर होगा और वे देश की संस्कृति को अच्छे ढंग से समझ सकेंगे.
>एलपीयू के डायरेक्टर-जनरल एच. आर. सिंगला का कहना है कि एनएसएस यूनिट्स का गठन इसलिए किया गया है ताकि आज के युवा समाज सेवा कर सकें और कुछ बेहतर सीख सकें. उनका ये भी मानना है कि ऐसी गतिविधिओं से युवा ना केवल अपनी बेहतरी कर सकेंगे बल्कि देश के विकास में भी अहम भूमिका अदा कर पाएंगे.
>सबसे दिलचस्प पहलू तो ये है कि यूनिवर्सिटी की जिन छात्र-छात्राओं ने स्वयं को एनएसएस यूनिट्स के लिए रजिस्टर्ड करवाया है, उनके विचार उच्च दर्जे के हैं. मधु ओबेरॉय, संतोष, गुरजीत राणा, सामुएल, आबिद, रुखसाना, जतिंदर व् अन्य छात्र-छात्राओं का कहना है कि इस पहल से उन्हें समाज के प्रति भागीदारी, सेवा और उपलब्धियों को विकसित करने का मौका मिला है.
>आज देश भर के युवाओं में मधु ओबेरॉय, संतोष और उनके अन्य साथियों जैसा जज्बा पैदा करने की आवश्यकता है जबकि देश के युवाओं की अच्छी खासी संख्या भटकाव के मोड़ पर है. भटकाव की इस स्थिति में युवाओं को कोई सही राह दिखानेवाला नहीं मिल रहा है. आज देश के अधिकतर युवा पश्चिम की सभ्यता का आँखें मूँद कर अनुसरण कर रहे हैं, अपने बड़े-बुजुर्गों की इज्ज़त करना भूल चुके हैं. ऐसी बात नहीं है कि युवाओं को दूसरों का अनुसरण नहीं करना चाहिए. वे ऐसा जरूर करें. मगर, थोडा सोच-समझ कर. ऐसा ना हो कि भविष्य में उन्हें पछताना पड़े.
>आजकल हम लोग छोटी-छोटी बात के लिए सरकार का मूंह ताकते हैं. युवाओं की स्थिति बदले, इसके लिए भी सरकार की तरफ ही देख रहे हैं. स्वयं कुछ नहीं कर रहे. वैसे युवाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेवारी ना केवल माता-पिता की बनती है, बल्कि शैक्षणिक संस्थायों की भी बनती है. शैक्षणिक संस्थायों को चाहिए की वे कुछ एक छात्र-छात्राओं को ही कम्युनिटी सर्विस के लिए ना चुनें. संस्था के सभी छात्र-छात्राओं को इसका अवसर दें. अगर ऐसा हो जाता है तो देश में एक दिन नयी क्रांति आ सकती है जिसकी किसी ने कल्पना भी ना की होगी.
>अंत में:
>क्या किसी भी शैक्षणिक संस्था में सभी छात्र-छात्राओं को कम्युनिटी सर्विस का अवसर दिया जाना चाहिए?
>एलपीयू के डायरेक्टर-जनरल एच. आर. सिंगला का कहना है कि एनएसएस यूनिट्स का गठन इसलिए किया गया है ताकि आज के युवा समाज सेवा कर सकें और कुछ बेहतर सीख सकें. उनका ये भी मानना है कि ऐसी गतिविधिओं से युवा ना केवल अपनी बेहतरी कर सकेंगे बल्कि देश के विकास में भी अहम भूमिका अदा कर पाएंगे.
>सबसे दिलचस्प पहलू तो ये है कि यूनिवर्सिटी की जिन छात्र-छात्राओं ने स्वयं को एनएसएस यूनिट्स के लिए रजिस्टर्ड करवाया है, उनके विचार उच्च दर्जे के हैं. मधु ओबेरॉय, संतोष, गुरजीत राणा, सामुएल, आबिद, रुखसाना, जतिंदर व् अन्य छात्र-छात्राओं का कहना है कि इस पहल से उन्हें समाज के प्रति भागीदारी, सेवा और उपलब्धियों को विकसित करने का मौका मिला है.
>आज देश भर के युवाओं में मधु ओबेरॉय, संतोष और उनके अन्य साथियों जैसा जज्बा पैदा करने की आवश्यकता है जबकि देश के युवाओं की अच्छी खासी संख्या भटकाव के मोड़ पर है. भटकाव की इस स्थिति में युवाओं को कोई सही राह दिखानेवाला नहीं मिल रहा है. आज देश के अधिकतर युवा पश्चिम की सभ्यता का आँखें मूँद कर अनुसरण कर रहे हैं, अपने बड़े-बुजुर्गों की इज्ज़त करना भूल चुके हैं. ऐसी बात नहीं है कि युवाओं को दूसरों का अनुसरण नहीं करना चाहिए. वे ऐसा जरूर करें. मगर, थोडा सोच-समझ कर. ऐसा ना हो कि भविष्य में उन्हें पछताना पड़े.
>आजकल हम लोग छोटी-छोटी बात के लिए सरकार का मूंह ताकते हैं. युवाओं की स्थिति बदले, इसके लिए भी सरकार की तरफ ही देख रहे हैं. स्वयं कुछ नहीं कर रहे. वैसे युवाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेवारी ना केवल माता-पिता की बनती है, बल्कि शैक्षणिक संस्थायों की भी बनती है. शैक्षणिक संस्थायों को चाहिए की वे कुछ एक छात्र-छात्राओं को ही कम्युनिटी सर्विस के लिए ना चुनें. संस्था के सभी छात्र-छात्राओं को इसका अवसर दें. अगर ऐसा हो जाता है तो देश में एक दिन नयी क्रांति आ सकती है जिसकी किसी ने कल्पना भी ना की होगी.
>अंत में:
>क्या किसी भी शैक्षणिक संस्था में सभी छात्र-छात्राओं को कम्युनिटी सर्विस का अवसर दिया जाना चाहिए?
सोमवार, 31 अक्टूबर 2011
सड़क दुर्घटनाएं क्यों?
>आए दिन समाचारपत्रों में सड़क दुर्घटनाओं की दु:खद ख़बरें प्रकाशित होती हैं. हम सभी एक नजर डाल कर खबर पढ़ते हैं, कुछ देर बाद सब कुछ भूल जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही ना हो. लेकिन, वास्तविकता ये है
कि हालात बेहद चिंताजनक हैं. प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में हर साल करीब चार हजार लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और करीब 16 लोग हर रोज घायल हो रहे हैं. वर्ष 2010 में राज्य में कुल 6 ,641 सड़क हादसे हुए. इनमें 3 ,424 लोगों की मौत हुई तो 5,854 लोग घायल हुए हैं. राज्य के अकेले लुधियाना शहर की स्थिति अति गंभीर है. यहां साल 2010 में 222 सड़क दुर्घटनाओं में 227 लोगों की मौत हुई.
>आखिर ऐसा क्या है कि सड़क दुर्घटनाएं रुक नहीं पा रहीं. इस के पीछे कई कारण हो सकते हैं. असल बात तो ये है कि आज की भागमभाग जिंदगी में हर कोई जल्दी में है. लोगों के पास समय कम है और काम ज्यादा. जैसे - जैसे आईटी का प्रसार हो रहा है, जिंदगी की गति तेज और तेज होती जा रही है. देखने में लगता है कि हमें सुख - सुविधाएँ मिल रही है. मगर ऐसा वास्तव में है नहीं. मोबाइल हो या इन्टरनेट, या फिर कोई और नया उपकरण, इस से काम कि जिम्मेवारी बढ़ती ही है, कम नहीं होती. यही वजह है कि हम में से हर कोई तेजी में है. हर व्यक्ति वक़्त को थाम लेना चाहता है. इसी जल्दबाजी का नतीजा अक्सर ये होता है कि हम में से ही कई लोग सड़क पर दुर्घटना का शिकार बन जाते हैं.
>सड़क दुर्घटनाओं के पीछे मदिरा या अन्य नशे भी एक कारण हैं. नशे की लत की वजह से इंसान खुद तो मौत के मुंह में जाता ही है, अपने पारिवारिक सदस्यों का जीवन भी खतरे में डाल देता है. कई बार दुर्घटना स्वयं घट जाती है. इस के पीछे घटिया ऑटो पार्ट्स होते हैं जो कि जाली होते हैं.
>अक्सर देखने में आता है कि युवा वाहनों पर बैठ कर मटरगश्ती करते हैं. सड़क को अपने बाप की जागीर समझ कर यहाँ-वहां तेज रफ्तारी से घूमते हैं. और फिर, दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं.
>बहुत बार ऐसा भी होता है कि सडकों की खस्ता हालत की वजह से दुर्घटनाएं हो जाती हैं. कई बार सरकारी करमचारियों की लापरवाही भी इस की वजह बन जाती है. मसलन, कई बार अँधेरे में चालक दुर्घटना का शिकार बन जाते हैं क्योंकि मैनहोल बिना ढक्कन के होता है.
>अगर हम सभी स्वयं पर नियंत्रण रखे तो काफी हद तक दुर्घटनाएं रुक सकती हैं. सरकार अपनी तरफ से तो काफी कुछ कर ही रही है, हमें भी सावधानी की आवश्यकता है.
>अंत में:
>सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है?
कि हालात बेहद चिंताजनक हैं. प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में हर साल करीब चार हजार लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और करीब 16 लोग हर रोज घायल हो रहे हैं. वर्ष 2010 में राज्य में कुल 6 ,641 सड़क हादसे हुए. इनमें 3 ,424 लोगों की मौत हुई तो 5,854 लोग घायल हुए हैं. राज्य के अकेले लुधियाना शहर की स्थिति अति गंभीर है. यहां साल 2010 में 222 सड़क दुर्घटनाओं में 227 लोगों की मौत हुई.
>आखिर ऐसा क्या है कि सड़क दुर्घटनाएं रुक नहीं पा रहीं. इस के पीछे कई कारण हो सकते हैं. असल बात तो ये है कि आज की भागमभाग जिंदगी में हर कोई जल्दी में है. लोगों के पास समय कम है और काम ज्यादा. जैसे - जैसे आईटी का प्रसार हो रहा है, जिंदगी की गति तेज और तेज होती जा रही है. देखने में लगता है कि हमें सुख - सुविधाएँ मिल रही है. मगर ऐसा वास्तव में है नहीं. मोबाइल हो या इन्टरनेट, या फिर कोई और नया उपकरण, इस से काम कि जिम्मेवारी बढ़ती ही है, कम नहीं होती. यही वजह है कि हम में से हर कोई तेजी में है. हर व्यक्ति वक़्त को थाम लेना चाहता है. इसी जल्दबाजी का नतीजा अक्सर ये होता है कि हम में से ही कई लोग सड़क पर दुर्घटना का शिकार बन जाते हैं.
>सड़क दुर्घटनाओं के पीछे मदिरा या अन्य नशे भी एक कारण हैं. नशे की लत की वजह से इंसान खुद तो मौत के मुंह में जाता ही है, अपने पारिवारिक सदस्यों का जीवन भी खतरे में डाल देता है. कई बार दुर्घटना स्वयं घट जाती है. इस के पीछे घटिया ऑटो पार्ट्स होते हैं जो कि जाली होते हैं.
>अक्सर देखने में आता है कि युवा वाहनों पर बैठ कर मटरगश्ती करते हैं. सड़क को अपने बाप की जागीर समझ कर यहाँ-वहां तेज रफ्तारी से घूमते हैं. और फिर, दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं.
>बहुत बार ऐसा भी होता है कि सडकों की खस्ता हालत की वजह से दुर्घटनाएं हो जाती हैं. कई बार सरकारी करमचारियों की लापरवाही भी इस की वजह बन जाती है. मसलन, कई बार अँधेरे में चालक दुर्घटना का शिकार बन जाते हैं क्योंकि मैनहोल बिना ढक्कन के होता है.
>अगर हम सभी स्वयं पर नियंत्रण रखे तो काफी हद तक दुर्घटनाएं रुक सकती हैं. सरकार अपनी तरफ से तो काफी कुछ कर ही रही है, हमें भी सावधानी की आवश्यकता है.
>अंत में:
>सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है?
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011
औरतों पर अत्याचार क्यों?
>यकीनन ये खबर दुरुस्त है कि इस्लामाबाद (पाकिस्तान) के पंजाब प्रांत में एक आदमी ने अपनी पत्नी की नाक और होठ सिर्फ इसलिए काट दिए क्योंकि उसने एक शादी समारोह में नृत्य करने से मना कर दिया. वेहरी कस्बे के निवासी मोहम्मद अब्बास ने पत्नी गुलशन बीबी से एक शादी समारोह में नृत्य करने के लिए कह रहा था. पीड़िता के मना करने पर अब्बास गुस्से में आ गया और उसने गुलशन की नाक और होठ काट दिए. गुलशन को गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है. पुलिस ने अब्बास को गिरफ्तार कर लिया है.
>तरक्की के इस दौर में भी ऐसी ख़बरें पढने - सुनने को मिल रही हैं, ये बेहद खेदजनक बात है. आखिर गुलशन बीबी का क्या कसूर था कि उसका चेहरा बदसूरत कर दिया गया. क्या उसका कसूर इतना था कि वह औरतजात थी. किसी भी औरत का सबसे बड़ा गहना उसका खूबसूरत चेहरा होता है, जिसे अब्बास ने अपनी बीवी (कहने भर को) से छीन लिया. अगर वास्तव में वह गुलशन बीबी को अपनी जीवन संगिनी समझता तो ऐसा कुकृत्य कभी ना करता.
>क्या किसी भी समाज में मर्दों को ही सभी हक हासिल हैं? क्या औरतों का कोई हक नहीं? क्या उनके मन में इच्छाएं नहीं होतीं? अगर गुलशन बीबी ने शादी समारोह में नृत्य करने से मना कर दिया
तो इस से कौन सा आसमान टूट पड़ा था. बात दरअसल अहम की है. आखिर एक औरत की इतनी हिम्मत कैसे हो गयी कि अपने मर्द के "आदेश" को अनदेखा कर दिया.....शायद, अब्बास ने यही सोचा होगा. बड़े अफ़सोस कि बात है कि आज भी कुछ लोग औरत को "गुलाम" से कमतर नहीं समझते. एक ऐसा "गुलाम" जिसे अपने "मालिक" का हर "हुक्म" मानना पड़ता है. बेशक "हुक्म" वाजिब हो या ना हो.
>क्या अब्बास कभी गुलशन बीबी के चेहरे की खूबसूरती को लौटा सकेगा. इस "दुर्घटना" से गुलशन बीबी के दिल में जो "गहरे घाव" पैदा हुए हैं क्या उन्हें कभी भरा जा सकता है. जवाब शायद ना में ही होगा.
>अंत में;
>औरतों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए समाज क्या भूमिका निभा सकता है?
रविवार, 23 अक्टूबर 2011
गद्दाफी की मौत पर उठ रहे सवाल?
>लीबिया के सैन्य तानाशाह कर्नल मुअम्मार गद्दाफी की हत्या को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. जी हाँ, श्रीलंका ने लीबिया के पूर्व शासक मुअम्मर गद्दाफी की हत्या की निंदा करते हुए सैन्य तानाशाह की मौत को लेकर पूरे मामले की जांच किए जाने की मांग की है. ख़बरों के मुताबिक श्रीलंका के विदेश मंत्रालय की ओर से कड़े शब्दों में जारी बयान में कहा है कि श्रीलंका की सरकार गद्दाफी की मौत से जुड़े हालात पर सफाई चाहती है. गद्दाफी की श्रीलंका से पुरानी दोस्ती रही है.
>ख़बरों में बताया गया है कि सिरते में जिस वक्त एनटीसी के लड़ाकों ने गद्दाफी को पकड़ा, उस वक्त सैन्य तानाशाह ने लड़ाकों को जान बख्शने के एवज में काफी मात्रा में धन-दौलत देने का वादा किया. हमाद मुफ्ती अली नाम के एक लड़ाके ने बताया कि गद्दाफी अपनी जान के एवज में कुछ भी देने के लिए तैयार था. उसने कहा कि उसके पास काफी सोना और धन दौलत है.
>आखिर जनता के विद्रोह ने एक तानाशाह से मुक्ति पा ही ली. गद्दाफी ने लगभग 42 वर्ष तक लीबिया पर शासन किया. इस दौरान उसने अपने देश की जनता पर कई तरह के अत्याचार किये. यहाँ तक कि उन औरतों को भी बक्शा नहीं गया जो निरंतर उसकी सुरक्षा में तैनात रहा करती थीं. उनके साथ बलात्कार तक किये गए. अपने शासन के दौरान गद्दाफी ने अपार धन -दौलत एकत्र की. लेकिन, अंतिम समय इस धन - दौलत ने उसका साथ ना दिया. उसने लड़ाकों को धन-दौलत देने का लालच दिया. लेकिन, किसी ने उसकी एक ना सुनी. अंत में, गद्दाफी का जो हश्र हुआ उसके बारे में सभी जानते ही हैं.
>हर तानाशाह का एक दिन अंत होता है. और अंत भी बहुत बुरा होता है. इतिहास खोल कर देखा जाये तो सभी तानाशाहों का गद्दाफी जैसा ही अंत होता है. जनता में जब तानाशाही के प्रति रोष उत्पन्न होता है तो तानाशाही और तानाशाह का अंत होता ही है. सत्ता में बैठा तानाशाह ये समझ बैठता है कि इस धरती पर वह इंसान नहीं, भगवान् है और शेष लोग तो कीड़े-मकौड़े भर हैं. लेकिन, गद्दाफी जैसा तानाशाह अंत में ऐसी स्थिति में होता है कि अपनी भूल सुधारने लायक तो क्या माफ़ी के काबिल भी नहीं रहता.
>गद्दाफी की मौत उन शासकों के लिए सबक है जो अपने अधीन प्रजा पर अत्याचार करते हैं. बेशक गद्दाफी के खात्मे के तरीके को लेकर जांच किए जाने की अंतरराष्ट्रीय मंच पर मांग उठ रही है. लगता नहीं कि ऐसी मांगों का अब कोई औचित्य शेष रह गया है. ऐसी मांग उठाने वाले तब कहाँ थे जब गद्दाफी की तानाशाही जारी थी और लीबिया की जनता पिस रही थी, जुल्म सह रही थी? ये जनता का गुस्सा ही था कि गद्दाफी की जान बख्शने के हक में कोई भी नहीं था. उसे गली में घूम रहे किसी आवारा कुत्ते की मौत ही मार दिया गया. ऐसी मौत जो दर्दनाक थी......बिलकुल वैसी ही, जैसे उसने भी ना जाने कितने लीबियावासियों को दी होगी.
>अंत में?
>क्या गद्दाफी के खात्मे के तरीके को लेकर जांच किए जाने की अंतरराष्ट्रीय मंच पर की जा रही मांग में अब कोई औचित्य शेष रह गया है.
रविवार, 16 अक्टूबर 2011
सुविधाओं का अभाव क्यों?
>शिमला की रोपा पंचायत के लढैर (कुई नाला) गांव से एक बेहद दर्दनाक खबर पढने को मिली है. इस खबर के मुताबिक एक गर्भवती महिला की सड़क सुविधा न होने के कारण मौत हो गई है. खबर में बताया गया है कि 21 वर्षीय रीना कुमारी को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई. सड़क की हालत बेहद खराब होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी और युवती ने दम तोड़ दिया. हालांकि महिला की नवजात बच्ची स्वस्थ है। रोपा पंचायत के प्रधान रतन चंद भारती का कहना है कि पंचायत ने कई बार प्रस्ताव भेज कर सड़क बनाने की मांग की, लेकिन अब तक सड़क नहीं बन पाई है.
>ये बेहद संगीन मामला है. ऐसी कई घटनाएँ देश के अन्य कोनों में भी घटित होती होंगी. मगर, सभी घटनाएँ मीडिया में नहीं आ पाती हैं. सवाल तो ये उठता है कि ऐसी घटनाएँ होती ही क्यों हैं. आज़ादी के बाद भी अगर ऐसी घटनाएं हो रही हैं तो यह बहुत शर्मनाक बात है. देश की जनता से तरह - तरह के कर वसूल किये जाते हैं. बदले में सुविधाएं भी जनसामान्य को उपलब्ध नहीं की जाती. इसके लिए किस की जवाबदेही है. आखिर रीना कुमारी का क्या क्या कसूर था कि उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. क्या उसका दोष यही था कि उसे एक ऐसे गाँव में रहना पड़ रहा था जहाँ सुविधाओं का अभाव था.
>होना तो ये चाहिए कि जिस भी अधिकारी ने गैरजिम्मेवाराना रवैया दिखाते हुए पंचायत के सड़क बनाने के प्रस्तावों की बार-बार अनदेखी की है, उसके के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए और सड़क का जल्द से जल्द निर्माण करना चाहिए ताकि किसी अन्य रीना को अपने जीवन का बलिदान ना देना पड़े. इस सड़क का निर्माण करके इसका नाम रीना कुमारी के नाम पर रख देना चाहिए. अब तो यही रीना कुमारी को श्रधांजलि हो सकती है.
>देश के प्रशासनिक अधिकारियों को भी अपनी जिम्मेवारी समझते हुए अपने - अपने क्षेत्रों की एक सूची तयार करनी चाहिए कि किन क्षेत्रों में सुविधायों की कमी है ताकि उन्हें ठीक किया जा सके. अधिकारी भी केवल सरकारी संसाधनों पर ही निर्भर ना रहें. उन्हें अपने तौर पर प्रयास करने चाहियें कि कॉरपोरेट सेक्टर व् अन्य दानी सज्जनों का सहयोग भी हासिल करें ताकि सुविधायों का कहीं भी अभाव ना रहे. देश में अनगिनत ऐसे लोग हैं जो खुले दिल से समाज सेवा के लिए हर पल तैयार रहते हैं.
>अंत में:
>क्या प्रशासनिक अधिकारियों को अपने क्षेत्रों में सुविधायों का अभाव दूर करने के लिए निजी तौर पर प्रयास करने चाहियें?
बुधवार, 12 अक्टूबर 2011
परेशान जनता करे भी क्या?
>घूसखोरी की आदत बहुत बुरी है. एक बार लत पड़ जाते तो फिर हटती ही नहीं. देश की जनता घूसखोरों से बेहद परेशान है. अब लोगों ने सामूहिक तौर पर घूसखोरो से दो - दो हाथ कर लेने की ठान ली है. तभी तो एक ताज़ा समाचार में बताया गया है कि मुजफ्फरपुर. जिले, बिहार, के बोचहा स्थित उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक के शाखा प्रबंधक को ग्रामीणों ने कथित तौर पर घूस लेते रंगे हाथ दबोच लिया . यह अधिकारी इंदिरा आवास के एवज में एक ग्रामीण से 22 ,500 रुपये की कथित घूस ले रहा था. ग्रामीणों ने बैंक मैनेजर के साथ-साथ उनके एक दलाल को भी पकड़ लिया. इसके बाद ग्रामीणों ने इसकी सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने बैंक मैनेजर और दलाल को गिरफ्तार कर लिया है.
>सरकारी पदों पर बैठे अधिकारी मोटी तनख्वाहें लेते हैं. इस के अतिरिक्त अन्य सुख-सुविधाएं भी उनकों हासिल होती हैं. बावजूद इसके वे लोग घूस लेने से बाज नहीं आते. एक बार भी यह नहीं सोचते कि घूस देने वाले ने कितनी मेहनत से पैसा कमाया होगा, और वे उससे बेशर्मी से घूस की रकम वसूल करके अपनी जेबों में ठूंस लेते हैं. लेकिन, घूस का लिया हुआ पैसा कभी ना कभी तो अपना असर दिखता ही है. आज नहीं तो कुछ अरसे बाद. अक्सर देखा है कि एक व्यक्ति हर नाजायज तरीके से पैसा कमाता है. अंत में एक वक़्त आता है कि उस पैसे का इस्तेमाल करने वाला ही परिवार में ओई नहीं बचता. या फिर ऐसा भी देखा है की एक व्यक्ती हर नाजायज तरीका इस्तेमाल करके जायदाद बना लेता हैं. अंत में, जायदाद खंडहर में तब्दील हो जाती है क्योंकि परिवार में कोई उसे इस्तेमाल करने वाला ही शेष नहीं रह जाता. ऐसा ही और भी बहुत कुछ घट जाता है. वैसे तो सब कुछ नियती के हाथ में ही होता है.
>उक्त मामले में अगर लोग चाहते तो पुलिस या सतकर्ता विभाग से भी मदद मांग सके थे. मगर, जनता अब सब कुछ देख चुकी है. इसीलिए, अब उसने स्वयं ही घूसखोरो से निबटने की ठान ली है. पुलिस और सम्बंधित विभागों को भी इस बात पर गौर करना चाहिए कि अब जनता उन्हें पहले सूचना क्यों नहीं देती. क्या जनता का उन पर से भरोसा उठ गया है. यह एक विचारणीय विष्य है.
>अंत में;
>क्या जनता का घूसखोरों से स्वयं ही निबटना उचित है?
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011
किस सदी में जी रहे हैं हम?
>ढाका से आयी एक खबर में बताया गया है कि शुक्रवार को साउदी अरब की राजधानी रियाद में आठ बांग्लादेशी प्रवासियोंका सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर दिया गया. इन आठ बांग्लादेशियों पर एक सिक्योरिटी गार्ड की हत्या का आरोप था. इस नृशंस कार्रवाई की बांग्लादेश सरकार और मानवाधिकार ग्रुप ने कड़े शब्दों में आलोचना की है. ह्यूमन राइट्स ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक हस्सीबा हज सहरोइ ने कहा है कि साउदी अरब में कोर्ट द्वारा की गई यह कार्रवाई निंदनीय है. उन्होंने यह भी कहा है कि अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर यदि देखें तो यह अनुचित है.
>खबर रौंगटे खड़े कर देने वाली है. यकीन करना मुश्किल है कि आज के दौर में भी ऐसी सजा सार्वजनिक रूप से दी जा रही है. तरक्की के इस दौर में एक तरफ दुनिया चाँद पर बस्तियां बसाने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाएँ हो रही हैं. क्या हम आज भी पुरातन युग में जी रहे हैं?
>किसी भी मुजरिम को सजा इस लिए दी जाती है ताकि वह भविष्य में सुधर जाये. सजा से अन्य लोगों को नसीहत भी मिलती है कि वे भी कोई गुनाह ना करें अन्यथा उन्हें भी ऐसी ही सजा भुगतनी पड़ सकती है. मगर सजा का ये अर्थ नहीं है कि मानवता को पूरी तरह से रौंद दिया जाये. किसी मुजरिम का सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने से क्या भविष्य में अपराध कम हो सकता है. ऐसा लगता तो नहीं. सजा के और भी कई ढंग हैं. अगर किसी मुजरिम को मौत की सजा ही देनी है तो उसे फांसी दी जा सकती है.
>वैसे तो ह्यूमन राइट्स ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक ने घटना कि निंदा की है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. इस मुद्दे पर सभी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार गुटों व् संस्थाओं को एकजुट हो कर आम राय बनाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इस तरह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की उल्लंघना ना हो सके.
>अंत में:
>क्या सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने जैसी सजा पर रोक लगनी चाहिए?
>खबर रौंगटे खड़े कर देने वाली है. यकीन करना मुश्किल है कि आज के दौर में भी ऐसी सजा सार्वजनिक रूप से दी जा रही है. तरक्की के इस दौर में एक तरफ दुनिया चाँद पर बस्तियां बसाने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाएँ हो रही हैं. क्या हम आज भी पुरातन युग में जी रहे हैं?
>किसी भी मुजरिम को सजा इस लिए दी जाती है ताकि वह भविष्य में सुधर जाये. सजा से अन्य लोगों को नसीहत भी मिलती है कि वे भी कोई गुनाह ना करें अन्यथा उन्हें भी ऐसी ही सजा भुगतनी पड़ सकती है. मगर सजा का ये अर्थ नहीं है कि मानवता को पूरी तरह से रौंद दिया जाये. किसी मुजरिम का सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने से क्या भविष्य में अपराध कम हो सकता है. ऐसा लगता तो नहीं. सजा के और भी कई ढंग हैं. अगर किसी मुजरिम को मौत की सजा ही देनी है तो उसे फांसी दी जा सकती है.
>वैसे तो ह्यूमन राइट्स ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक ने घटना कि निंदा की है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. इस मुद्दे पर सभी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार गुटों व् संस्थाओं को एकजुट हो कर आम राय बनाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इस तरह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की उल्लंघना ना हो सके.
>अंत में:
>क्या सार्वजनिक रूप से सिर कलम कर देने जैसी सजा पर रोक लगनी चाहिए?
सोमवार, 10 अक्टूबर 2011
स्विस बैंक से काला धन निकाल रहे नेता?
>आज एक बड़ी अहम खबर पढने में आयी है. उकलाना, हिसार (हरियाणा), में एक जनसभा को संबोधित करते हुए टीम अन्ना की अहम सदस्य किरण बेदी ने कहा है कि स्विस बैंक के अधिकारियों ने खुलासा किया है कि भारतीय नेता स्विस बैंक से काला धन निकाल रहे हैं और दूसरों के नाम से संपत्ति खरीद रहे हैं. उन्होंने आगे कहा है कि लोकपाल कानून होता तो ये लोग जेल के अंदर होते.
अगर सच में ऐसा हो रहा है तो यह बेहद दुखद बात है. इस सम्बन्ध में भारत सरकार को जल्दी से जल्दी कोई कदम उठाना चाहिए. देश कि जनता को इतनी भी भोली-भाली ना समझा जाये कि नेता कुछ भी करते जाएँ. आखिर उनकी देश की जनता के प्रति कोई जवाबदेही बनती है.
>केंद्र की सरकार की प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है. अगर उसने अभी भी इस सम्बन्ध में कोई ठोस कार्रवाही ना की तो देश का बहुत बड़ा नुक्सान हो सकता है और देश के भ्रष्ट नेता साफ़ तोर पर बच सकते हैं. सरकार ना केवल स्विस बैंक से काला धन वापस लाने का ठोस प्रयास करे बल्कि, उन नेताओं के नामों का भी पता लगाये जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी अभियान शुरू होने के बाद काला धन निकलवाया है और दूसरों के नाम से संपत्ति खरीद रहे हैं. सरकार ऐसे भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी करे.
>अगर आज भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई ना की गए तो आने वाला वक़्त और भी खतरनाक हो सकता है जब भ्रष्टाचार की कोई सीमा शेष ना रहेगी. भ्रष्टाचार को अगर "आर्थिक आंतकवाद" का नाम दे दिया जाये तो कोई गलती ना होगी. भ्रष्ट लोगों के कारण आज देश में जितना विकास होना चाहिए था उतना हो नहीं रहा. विकास के नाम पर जो धन सरकारों द्वारा जारी किया जाता है, बीच रास्ते में ही उसका एक बड़ा हिस्सा खुर्द-बुर्द कर दिया जाता है. सरकारी टेंडर जारी करने में ही भ्रष्टाचार हो जाता है. मतलब कि हर कदम पर भ्रष्टाचार अपने पाँव पसारे बैठा है.
>अंत में:
>स्विस बैंक के अधिकारियों के खुलासे के बाद कि भारतीय नेता स्विस बैंक से काला धन निकाल रहे हैं, सरकार को क्या कार्रवाई तुरंत करनी चाहिए?
रविवार, 9 अक्टूबर 2011
क्या यही है शिक्षा?
>दस रुपए को लेकर दुकानदार के बेटे की पिटाई की गयी है. आप विशवास करें या ना करें, ऐसा वास्तव में हुआ है. ये वाक्य बालूगंज, शिमला, स्थित एक दुकान में हुआ है. हमलावर युवकों ने दस रुपए को लेकर दुकानदार के बेटे की पिटाई कर डाली. साथ ही दुकान के शीशे भी फोड़ डाले। खबर के मुताबिक आरोपी युवक यूनिवर्सिटी के छात्र बताए जा रहे हैं. आठ छात्र शुक्रवार रात चौक पर स्थित दुकान पर पहुंचे. दुकान पर व्यापारी का नाबालिग बेटा मौजूद था. सामान खरीदने के बाद उनकी व्यापारी के बेटे से दस रुपए के लिए कहासुनी हो गई. उन्होंने तोडफ़ोड़ की और उसकी पिटाई कर डाली.
>पहली नज़र में लगता है कि यह एक मामूली सी घटना है. मगर, इस छोटी सी घटना के कारण कई प्रश्न खड़े होते हैं. दुकानदार का बेटा नाबालिग था. मालूम नहीं वह पढ़ा - लिखा भी होगा या नहीं. लेकिन, जिन युवकों ने उस पर कथित तौर और छोटी सी बात के लिए आक्रमण किया वे लोग तो अनपढ़ ना थे, यूनिवर्सिटी के छात्र थे. ऐसे किसी के साथ झगडा करना, तोड़-फोड़ करना सभ्य समाज में शोभा नहीं देता. क्या शिक्षा के यही अर्थ हैं कि शरेआम किसी पर भी धावा बोल दो. अगर उन्हें शिकायत थी तो दुकानदार की प्रतीक्षा कर लेते. अपनी शिकायत उसके सामने रखते, ना कि नाबालिग बच्चे को पीटते. इस तरह तो शिक्षा के कोई मायने नहीं शेष नहीं रह जाते. अगर वे स्वयं ही समाज में इस तरह का व्यवहार करेंगे तो अपनों से छोटों के लिए रोल मॉडल किस तरह बनेंगे.
>आज जरूरत है कि युवकों में धैर्य उत्पन्न हो. इस तरह छोटी - छोटी बातों पर अपना धैर्य खोना अच्छी बात नहीं है. इस तरह से वे कोई बड़ा अपराध भी कर सकते हैं. समाज में हमेशा के लिए अपनी मान -मर्यादा खो सकते हैं. पढ़े - लिखे युवकों को तर्क पर अपनी बात रखनी चाहिए. हर संभव प्लेटफोर्म पर जाना चाहिए. लेकिन, हिंसा का दामन थामना नहीं चाहिए. आज भी अहिंसा में बहुत बड़ी शक्ति है. युवकों को चाहिए कि वे अपने अन्दर इस शक्ति को पहचाने ओर इस का सदुपयोग करें.
>अंत में:
>आपकी नज़र में शिक्षा के सही मायने क्या हैं?
.
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
इतनी बर्बरता?
> समाज में दिन प्रतिदिन बर्बर घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है. ताज़ा ख़बरों में बताया गया है कि दरभंगा. जिले के सिंहवारा पुलिस स्टेशन स्थित ठाकानिया गाँव में एक व्यक्ती ने अपनी पत्नी की धारदार हथियार से कथित तौर पर गला काट हत्या कर दी. इतना ही नहीं आरोपी ने अपनी पत्नी के कटे सिर को हाथ में लिया और बीच सड़क पर आ खड़ा हुआ. उसके एक हाथ में हथियार और दूसरे में पत्नी के कटे सिर को देख लोग खौफजदा हो गए. मामले की सूचना पाकर पहुंची पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया. पुलिस ने बताया कि इस हत्या के पीछे पारिवारिक विवाद है.
> आखिर समाज को क्या होता जा रहा है. मासूम सा दिखने वाला इंसान, हाड-मांस से बना ये इंसान इतना बर्बर क्यों होता जा रहा है. अक्सर ऐसी ख़बरें सुनने या पढने को मिल जाती हैं जिन में हत्या के पीछे पारिवारिक विवाद होता है. आज इंसान अपना मानसिक संतुलन खोता चला जा रहा है. आज परिवारों में अविश्वास पैदा होता जा रहा है. अक्सर तकरार होती दिखाई देती हैं. छोटी सी बात पर खून - खराबा हो जाता है. इंसान के जीवन का कोई मूल्य शेष नहीं रहा. पैसा, जमीन-जायदाद व् लालच ही सब कुछ बन चूका है. रिश्ते नाते कहीं पीछे, बहुत पीछे छूट से गए लगते हैं.
> समाज में इतनी गिरावट का क्या कारण है. ये विचारयोग्य प्रश्न है. अगर परिवारों में ही इस तरह की हिंसक घटनाएँ होंगी तो भला कौन किस पर विश्वास करेगा. इस तरह तो समाज का सारा ताना-बाना ही बिखर जाएगा. इंसानी बस्तियां, जंगल बन जायेंगी.
>अंत में;
>मानसिक संतुलन बरकरार रखने के लिए क्या करना चाहिए?
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011
भीतर का रावण ?
>अन्ना हजारे ने आज अपने गांव रालेगढ़ सिद्धी में रावण दहन किया. इस मौके पर वहां मौजूद लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा उन्होंने कहा कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने अंदर मौजूद रावण को खत्म कर स्वच्छ समाज बनाने की ओर कदम बढ़ाएंगे. अन्ना ने ये भी कहा कि हम सभी के अंदर कहीं ना कहीं रावण मौजूद है, जिसे बाहर निकालना बहुत जरूरी है. किसी के अंदर अहंकार के रुप में तो किसी के अंदर भ्रष्टाचार के रुप में. हमें कोशिश कर किसी भी तरीके से रावण को बाहर करना होगा, तभी एक नए समाज का तानाबाना बुना जा सकता है.
> जो बात अन्ना ने कही हैं उस में बहुत गहराई है. सच ही तो है, रावण हम सब में कहीं ना कहीं मौजूद है. यही वजह है कि आये दिन बलात्कार की घटनाएँ होती हैं, क़त्ल होते हैं, चोरी होती है, डाके पड़ते हैं, अपहरण होते हैं, भ्रष्टाचार होता है. और भी जाने क्या कुछ नहीं होता. हर बरस दशहरे वाले दिन रावण दहन होता है, रावण के पुतले देश भर में जलाये जाते हैं. इन आयोजनों पर करोड़ों - अरबों रूपए खर्च कर दिए जाते हैं. जबकि, इस भारी भरकम राशि से समाज के लिए कई सार्थक कार्य किये जा सकते हैं. इन कार्यों से अनेकों जरूरतमंद देशवासियों को लाभ पहुँच सकता है. समारोह फिर भी किये जा सकते हैं, लेकिन सादा ढंग से.
>हर साल रावण दहन करने के बहाने लोग रावण को यादों में, दिल में जिन्दा रखते हैं. कई महीनों पहले ही समारोहों के आयोजन की तेयारियां शुरू हो जाती हैं. रावण दहन करके उसे दोबारा जिन्दा कर दिया जाता है, उसका फिर से दहन करने के लिए. लेकिन, हम लोगों के भीतर जो रावण रहता है, उसके दहन के बारे में हम लोगों ने कभी सोचा ही नहीं.
अंत में:
हम लोगों के भीतर बसते रावण का दहन कैसे हो सकता है?
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011
बेटी बचाओ
>भोपाल से एक बड़ी अच्छी खबर आयी है. समाज में बेटियों के महत्व को रेखांकित करने के मकसद से मध्यप्रदेश में अनूठा 'बेटी बचाओ' अभियान पांच अक्टूबर से शुरू होगा. इस अभियान के दौरान बेटियों के प्रति समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण लाने और मानसिकता बदलने के लिए समाज को जागृत करने का आग्रह किया जाएगा.
>ये एक प्रशंशनीय पहल है. वैसे इस से पहले पंजाब में ऐसा ही एक अभियान बठिंडा से शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने भी चलाया था. बल्कि, अभी भी जारी है. चाहिए तो ये कि अन्य प्रदेशों की सरकारें भी ऐसा ही अभियान चलायें. आज जरूरत है कि आम लोगों को जागरूक किया जाये कि बेटे ओर बेटी में कोई अंतर नहीं है. इस में कोई दो राय नहीं कि बेटी ने शादी के बाद अपने ससुराल घर चले जाना होता है. ज़माना बदल चुका है. आज कल बेटे भी घर जंवाई बनने में देर नहीं लगाते. या फिर शादी के बाद अलग से अपना घर बसाने को प्राथमिकता देते हैं. अंत में बूढ़े माता-पिता घर में अकेले ही रहते हैं. लाचार सी हालत में.
>बेटी तो फिर भी माँ-बाप का हाल-चाल पूछने चली जाती है. बेटा बेचारगी का शिकार बना रहता है. पत्नी के डर के कारण माता-पिता के पास भी नहीं जाता. यकीनन ऐसा सभी परिवारों में नहीं होता. लेकिन, ऐसा सब कुछ अक्सर देखने सुनने को मिल जाता है. वैसे भी बेटी किसी से कम तो नहीं. आज की बेटी क्या कुछ नहीं बन सकती. वह बड़े से बड़े ओहदे पर पहुँच चुकी है. मर्दों के कंधे के साथ कन्धा मिला कर मेहनत कर रही है. कई मामलों में तो देखा गया है कि बेटी, बेटे से अधिक जिम्मेवार साबित होती है. तो फिर बेटी को नाकारा क्यों जाये . उसका स्वागत क्यों ना किया जाये. इसलिए आयें, हम सब भी 'बेटी बचाओ' अभियान में आज से ही शामिल हो जाएँ.
>अंत में;
>बेटी बचाओ' अभियान में आम लोग कैसे सम्मिलित हो सकते हैं?
सोमवार, 3 अक्टूबर 2011
अन्ना हुए अब महात्मा ?
जी हाँ, गांधीवादी अन्ना हजारे को उनके गांववाले (रालेगण सिद्दि) अब महात्मा कहकर पुकारेंगे. दरअसल, इस संबंध में रालेगण सिद्धि ग्रामसभा ने एक प्रस्ताव पास कर दिया है. हालांकि खुद अन्ना ने कहा है कि वह महात्मा बनने योग्य नहीं हैं. उन्होंने कहा, मुझे सामान्य व्यक्ति ही रहने दें. गांधीजी की तरह महात्मा का संबोधन मेरे नाम के साथ न जोड़ें. दूसरी ओर, कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है. अन्ना अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन उन्हें महात्मा गांधी के बराबर पर खड़ा नहीं किया जा सकता.
अन्ना और राशिद अल्वी दोनों अपनी जगह पर ठीक हैं. अन्ना अगर चाहते हैं कि उन्हें सामान्य व्यक्ति ही रहने दिया जाये तो रालेगण सिद्धि ग्रामसभा को उनकी बात रखनी चाहिए. इसी बात में अन्ना का सम्मान है. आप कोई भी उपाधी या नाम किसी पर जबरदस्ती थोप नहीं सकते. ये तो उस सम्मानित व्यक्ती का ही अपमान होगा. अन्ना का एक अपना व्यक्तित्व है. उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता. आज भी नहीं, शायद भविष्य में भी नहीं.
वैसे, यहाँ ये बात भी विचारयोग्य है कि महात्मा शब्द का किसी ने पटेंट नहीं करवा लिया है. महात्मा शब्द दो शब्दों महा और आत्मा से मिल कर बना है, जिस का अर्थ है महान आत्मा. और,
महान आत्मा किसी में भी हो सकती है. कोई भी संत पुरुष हो सकता है. देश में अनेकों ऐसे महापुरुष हैं, जिन्हें लोग महात्मा कह कर पुकारते हैं. लेकिन ऐसे लोग महात्मा कहलवा कर महात्मा गांधी का दर्जा हासिल नहीं कर जाते. हालाँकि, ऐसे महात्मा पुरुष अपना सम्मानजनक स्थान रखते हैं.
अंत में:
क्या अन्ना को अपने नाम के साथ महात्मा लगाना चाहिए?
रविवार, 2 अक्टूबर 2011
ईश्वरीय शक्ति से डरो
एक बार फिर.
हाँ, एक बार फिर किसी माँ ने अविकसित बच्ची के शव को कचरे में फेंका है. इस बार ये घटना सिविल अस्पताल ठियोग, शिमला, में घटित हुई है. करीब 28 सप्ताह की बच्ची का शव बायोमेडिकल वेस्ट से मिला है.
ऐसी घटनाएँ दिल को पसीज देने वाली हैं. माँ को ममता की देवी माना जाता है. लेकिन इस तरह की घटनाएँ माँ का एक दूसरा ही रूप प्रस्तुत करती हैं, एक क्रूर माँ का रूप. यकीन नहीं होता कि कोई भी औरत इस हद तक गिर सकती है. ऐसी औरत को ऐसा करते हुए एक बार ये सोच लेना चाहिए कि अगर उस को जन्म देने वाली उसकी अपनी माँ उसके साथ ऐसा सलूक करती तो आज वह जिंदा ना होती. बरसों पहले किसी कूड़े के ढेर पर दम तोड़ गयी होती.
ऐसी घटनाओं से जहाँ समाज कलंकित होता है वहीँ मानवता को भी ठेस पहुँचती है. आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों होती है कि किसी भी माँ को ऐसा शर्मनाक कदम उठाना पड़ता है. इस पर समाज को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है. इस में उस बच्ची का क्या कसूर था कि उसे जन्म से पहले ही मार दिया गया है. हो सकता वह बड़ी हो कर ऊंचा ओहदा पा लेती. कोई विज्ञानिक, डॉक्टर, मंत्री या देश की प्रधानमंत्री ही बन जाती. अविकसित बच्ची के साथ तो अन्याय हुआ ही है, उसकी माँ की भी ये बदनसीबी है कि उस ने फूल जैसी नाजुक बच्ची पर इतना जुल्म किया.
कोई भी माँ ऐसा पापकर्म करने करने से पहले इतना जरूर सोच ले कि इस संसार में बस लेन - देन ही तो है. जब हिसाब - किताब मुकम्मल हो जाता है तो इंसान दुनिया से विदा हो जाता है. वक्त आयेगा जब उस बदनसीब माँ को अपने पापकर्म का हिसाब देना पडेगा.
अंत में:
अविकसित बच्चों को कचरे के डिब्बों से बचाने के लिए समाज क्या भूमिका अदा कर सकता है?
शनिवार, 1 अक्टूबर 2011
सुना आपने ?
हरदोई, उत्तर प्रदेश, में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव पर अब तक का सबसे तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि बाबा रामदेव जैसे संतों को गले में पत्थर बांध कर डुबा देना चाहिए.
पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा रामदेव ठग है, ठग था और ठग ही रहेगा। व्यवसाय करना स्वामियों का काम नहीं होता है. जिसने सब मोह त्याग दिए उसका व्यवसाय से क्या मतलब. जैसा कि मनुस्मृति में लिखा है कि जो साधु-संत व्यवसाय करने लगे उनके गले में पत्थर बांध कर उन्हें डुबा देना चाहिए.
दिग्विजय सिंह का ये वक्तव्य बेहद आश्चर्यजनक है. लगता नहीं कि वे आज के दौर की बात कर रके हैं. अगर वे चाहते हैं कि बाबा रामदेव जैसे संतों को गले में पत्थर बांध कर डुबा देना चाहिए तो देश में मुकम्मल तौर पर वही कानून लागू हो जो उस काल में था, जब मनुस्मृति की रचना की गयी थी. देश के लोगों का वही रहन- सहन हो जो उस काल में हुआ करता था. आवाजाही के वही साधन हों जो उस समय में हुआ करते थे. देश में वही भाषा बोलचाल में हो जो उस काल में प्रचलित थी. रहने की व्यवस्था भी वैसी ही हो जैसे उस काल में थी. और भी सब कुछ वैसा ही हो, जैसा उस काल में था जब मनुस्मृति की रचना की गयी थी.
वैसे, मनुस्मृति में इस बात का भी वर्णन है कि एक शासक कैसा हो. एक शासक के गुणों का वर्णन करते हुए मनुस्मृति में लिखा गया है कि उसे बुद्धिमान, दोष मुक्त, सभ्य, ईमानदार, आत्म नियंत्रक, बड़ों का आदर करने वाला होना चाहिए. जबकि आज देश में किस तरह के शासक हैं इस के बारे में देशवासी बाखूबी तौर पर जानते हैं. उम्मीद है, दिग्विजय सिंह भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होंगे. कितने खेद की बात है कि देश की लोकसभा के 543 सांसदों में से लगभग 150 आपराधिक मामलों में संलिप्त हैं. इन में से लगभग 50 सांसद जघन्य अपराधों में संलिप्त हैं.
अंत में:
क्या आप को लगता है कि देश के शासकों को आत्मनिरीक्षण की जरूरत है?
गुरुवार, 29 सितंबर 2011
ऐसे नेता? ....तौबा-तौबा...
कितनी हैरानकुन बात है की जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को कहा कि संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से राज्य में आतंकवादी हमले दोबारा शुरू हो सकते हैं जिसे लेकर वह चिंतित हैं. उनका कहना है कि जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के नेता मुहम्मद मकबूल भट्ट को वर्ष 1984 में फांसी की सजा देने के बाद कश्मीर में आतंकवादियों की एक फौज तैयार हो गई थी. उन्हें चिंता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक फिर बढ़ जाएंगी जो इस समय काफी कम हैं. उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वह अफजल गुरु को मृत्युदंड दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं.
आखिर इस वक्तव्य का क्या मतलब है. क्या उमर अब्दुल्ला अपनी कमजोरी को छुपाना चाहते हैं या फिर इस वक्तव्य के पीछे कोई और बात है. उन्हें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं. अगर उन जैसे लोग ही मीडिया में इस तरह के वक्तव्य देंगे तो जनता में क्या सन्देश जाएगा. उनका द्वारा दिया गया ब्यान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. आंतकवाद कि समस्या को सख्ती से ही निबटा जा सकता है, प्यार से नहीं. पंजाब में भी आंतकवाद पैदा हुआ था. लेकिन, उसे सख्ती व् होशियारी से ख़त्म किया गया. ना तो सुरक्षा कर्मिओं ने और ना ही राज्य के नेताओं ने आंतकवाद के आगे अपने घुटने टेके. अगर किसी नेता ने राज्य या देश पर शासन करना है तो उसे दृढ़ता तो दिखानी ही पड़ेगी. सबसे पहले उसे देश के बारे में सोचना पडेगा. अन्यथा इसका भारी खामियाजा भुगतना पडेगा.
अगर उमर अब्दुल्ला को लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक बार फिर बढ़ जाएंगी तो उन्हें किस ने कहा है कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहें. वे जब चाहे इस्तीफ़ा दे सकते हैं. शायद जम्मू एवं कश्मीर को उनसे बेहतर मुख्यमंत्री मिल जाये.
अंत में;
क्या आपको लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं बढ़ जाएंगी?
आखिर इस वक्तव्य का क्या मतलब है. क्या उमर अब्दुल्ला अपनी कमजोरी को छुपाना चाहते हैं या फिर इस वक्तव्य के पीछे कोई और बात है. उन्हें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि वे एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं. अगर उन जैसे लोग ही मीडिया में इस तरह के वक्तव्य देंगे तो जनता में क्या सन्देश जाएगा. उनका द्वारा दिया गया ब्यान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. आंतकवाद कि समस्या को सख्ती से ही निबटा जा सकता है, प्यार से नहीं. पंजाब में भी आंतकवाद पैदा हुआ था. लेकिन, उसे सख्ती व् होशियारी से ख़त्म किया गया. ना तो सुरक्षा कर्मिओं ने और ना ही राज्य के नेताओं ने आंतकवाद के आगे अपने घुटने टेके. अगर किसी नेता ने राज्य या देश पर शासन करना है तो उसे दृढ़ता तो दिखानी ही पड़ेगी. सबसे पहले उसे देश के बारे में सोचना पडेगा. अन्यथा इसका भारी खामियाजा भुगतना पडेगा.
अगर उमर अब्दुल्ला को लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं एक बार फिर बढ़ जाएंगी तो उन्हें किस ने कहा है कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहें. वे जब चाहे इस्तीफ़ा दे सकते हैं. शायद जम्मू एवं कश्मीर को उनसे बेहतर मुख्यमंत्री मिल जाये.
अंत में;
क्या आपको लगता है कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाए जाने से घाटी में आतंकवादी घटनाएं बढ़ जाएंगी?
बुधवार, 28 सितंबर 2011
संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति क्यों?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बुधवार को संसद हमले के दोषी अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हो सकी. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस विधायकों के बीच झड़पों के कारण सदन की कार्यवाही कल तक स्थगित कर दी गई.
लेकिन, विचारयोग्य बात तो ये है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का प्रस्ताव विधानसभा में रखा ही क्यों गया. अफजल गुरु को पहले ही सजा सुनायी जा चुकी है. उस पर एक संगीन जुर्म सिद्ध हो चूका है. ख़बरों के मुताबिक भाजपा ने अफजल की दया याचिका से सम्बंधित प्रस्ताव पर भी जमकर हंगामा किया और ‘राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव वापस करो, वापस करो’ के नारे लगाए।
भाजपा का ये कदम शायद गलत भी नहीं है. अगर उसने अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव करार दिया है तो इस में गलत भी क्या है. ऐसा प्रस्ताव लाने वाले ये मत भूलें कि वे भी भारत में रहते हैं. उन्हें ये बात नहीं भूल जानी चाहिए कि अफजल गुरु संसद पर हमले का दोषी है. संसद पर हमला यानी देश पर हमला. क्या कोई भी नागरिक इस बात को स्वीकार कर लेगा कि ऐसे खतरनाक मुजरिम को दया दे देनी चाहिए?
वैसे भी कानून को अपना कार्य करने देना चाहिए. हर बात में राजनीति करना अच्छी बात नहीं. संवेदनशील मुद्दों पर तो वैसे भी राजनीति करने से परहेज करना चाहिए. अगर आंतकवादियों के प्रति दया दिखाई जाती रही तो उनके हौंसले बुलंद ही होंगे, कमजोर नहीं. ऐसे मामलों में तो ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि अन्य आंतकवादियों को भी सबक मिले.
देश में राजनीति करने नेताओं को चाहिए कि वे अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या उन्हें संवेदनशील मामलों पर राजनीति करनी चाहिए.
अंत में;
क्या संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति की इजाजत होनी चाहिए?
लेकिन, विचारयोग्य बात तो ये है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का प्रस्ताव विधानसभा में रखा ही क्यों गया. अफजल गुरु को पहले ही सजा सुनायी जा चुकी है. उस पर एक संगीन जुर्म सिद्ध हो चूका है. ख़बरों के मुताबिक भाजपा ने अफजल की दया याचिका से सम्बंधित प्रस्ताव पर भी जमकर हंगामा किया और ‘राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव वापस करो, वापस करो’ के नारे लगाए।
भाजपा का ये कदम शायद गलत भी नहीं है. अगर उसने अफजल गुरु से सम्बद्ध दया के प्रस्ताव राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव करार दिया है तो इस में गलत भी क्या है. ऐसा प्रस्ताव लाने वाले ये मत भूलें कि वे भी भारत में रहते हैं. उन्हें ये बात नहीं भूल जानी चाहिए कि अफजल गुरु संसद पर हमले का दोषी है. संसद पर हमला यानी देश पर हमला. क्या कोई भी नागरिक इस बात को स्वीकार कर लेगा कि ऐसे खतरनाक मुजरिम को दया दे देनी चाहिए?
वैसे भी कानून को अपना कार्य करने देना चाहिए. हर बात में राजनीति करना अच्छी बात नहीं. संवेदनशील मुद्दों पर तो वैसे भी राजनीति करने से परहेज करना चाहिए. अगर आंतकवादियों के प्रति दया दिखाई जाती रही तो उनके हौंसले बुलंद ही होंगे, कमजोर नहीं. ऐसे मामलों में तो ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि अन्य आंतकवादियों को भी सबक मिले.
देश में राजनीति करने नेताओं को चाहिए कि वे अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या उन्हें संवेदनशील मामलों पर राजनीति करनी चाहिए.
अंत में;
क्या संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति की इजाजत होनी चाहिए?
सोमवार, 26 सितंबर 2011
कब आयेगी सामाजिक समानता ?
लुधिआना, पंजाब, के जाने - मान चार्टड अकाउंटेंट राजीव के. शर्मा ने एक सन्देश भेज कर बेहद गंभीर मुद्दा उठाया है. उनका मत है कि वतन के लिए शहादत देने वालों के सपने तब तक मुकम्मल नहीं होंगे जब तक कि देश में सामाजिक समानता नहीं आती. इस बात में रत्ती भर भी शक की गुंजाइश नहीं है. आज देश की क्या स्थिति है, इस के बारे में हम सब जानते ही हैं.
अमीर और गरीब में फासला निरंतर बर्धता जा रहा है. जब से डेस्क में व्यवसायिक गतिविधिओं का प्रचलन बढ़ा है, हालत और भी गंभीर हो गई हैं. अमीरों के लिए माल्स खुल गए है. उनके लिए वातानुकूलित ट्रेनें चल पडी हैं. ना जाने क्या क्या सुख सुविधाएं पैदा हो चुकी हैं. दूसरी और आज भी गरीबों को भरपेट भोजन नहीं मिलता, रहने को छत नसीब नहीं होती और पहनने को ढंग के कपडे नहीं मिलते. ट्रेनों के डिब्बों पर नजर डाली जाये तो उनमें आम आदमी माल गोदाम की तरह भरा हुआ मिलता है.
देश को 1947 में आजादी प्राप्त हुई थी. इतने बरसों बाद भी देश में सामाजिक समानता दिखाई क्यों नहीं देती. इस के लिए कौन लोग जिम्मेवार हैं. देश के नेता तो हैं ही. हब सब भी इस के लिए जिम्मेवार हैं. हम सब में भी जागरूकता की कमी दिखाई देती है. हमें भी अपना कर्तव्य समझ कर कुछ ना कुछ अवश्य करना चाहिए. किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा दिलवाने में मदद कर देनी चाहिए. गरीब का बच्चा एक बार अपने पाँव पर खड़ा हो गया तो उसकी आने वाली नस्लें सुधर जाएँगी. देश सुधर जाएगा. अमीरों को चाहिए कि किसी किस्म का दिखावा ना कारें. अफ़सोस तो इस बात का है कि अमीर दिखावा करके अपने को सबसे महान सिद्ध करना चाहता है. तभी तो बहुमंजिला महल खड़े करके सड़कों पर रहने वाले गरीबों का मजाक उडाता है.
अंत में:
सामाजिक समानता लाने में आम नागरिक की क्या भूमिका हो?
अमीर और गरीब में फासला निरंतर बर्धता जा रहा है. जब से डेस्क में व्यवसायिक गतिविधिओं का प्रचलन बढ़ा है, हालत और भी गंभीर हो गई हैं. अमीरों के लिए माल्स खुल गए है. उनके लिए वातानुकूलित ट्रेनें चल पडी हैं. ना जाने क्या क्या सुख सुविधाएं पैदा हो चुकी हैं. दूसरी और आज भी गरीबों को भरपेट भोजन नहीं मिलता, रहने को छत नसीब नहीं होती और पहनने को ढंग के कपडे नहीं मिलते. ट्रेनों के डिब्बों पर नजर डाली जाये तो उनमें आम आदमी माल गोदाम की तरह भरा हुआ मिलता है.
देश को 1947 में आजादी प्राप्त हुई थी. इतने बरसों बाद भी देश में सामाजिक समानता दिखाई क्यों नहीं देती. इस के लिए कौन लोग जिम्मेवार हैं. देश के नेता तो हैं ही. हब सब भी इस के लिए जिम्मेवार हैं. हम सब में भी जागरूकता की कमी दिखाई देती है. हमें भी अपना कर्तव्य समझ कर कुछ ना कुछ अवश्य करना चाहिए. किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा दिलवाने में मदद कर देनी चाहिए. गरीब का बच्चा एक बार अपने पाँव पर खड़ा हो गया तो उसकी आने वाली नस्लें सुधर जाएँगी. देश सुधर जाएगा. अमीरों को चाहिए कि किसी किस्म का दिखावा ना कारें. अफ़सोस तो इस बात का है कि अमीर दिखावा करके अपने को सबसे महान सिद्ध करना चाहता है. तभी तो बहुमंजिला महल खड़े करके सड़कों पर रहने वाले गरीबों का मजाक उडाता है.
अंत में:
सामाजिक समानता लाने में आम नागरिक की क्या भूमिका हो?
शनिवार, 24 सितंबर 2011
जाली नोटों का धंधा?
बिहार के जहानाबाद जिले के मखदुमपुर थाना क्षेत्र में पुलिस ने शनिवार को एक होटल पर छापामार कर 75,000 रुपए के जाली नोट बरामद किये. खबर के मुताबिक इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. इस तरह की खबर कोई नयी बात नहीं है. मीडिया में अक्सर ऐसी खबर पढने या सुनने को मिल ही जाती है. देश का शायद ही कोई ऐसा कोना हो जहाँ लोग इस समस्या का सामना ना कर रहे हों.
जाली करंसी का चलन देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक है. ऐसी भी खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं कि बैंक के ऐ. टी .एम् . से भी जाली करंसी निकल आती है. शामत बेचारे आम आदमी की आ जाती है जो मेहनत से कमाई करता है मगर उसके नसीब में जाती नोट आ जाता है.
आखिर किसी भी व्यक्ती की इतनी हिम्मत क्यों हो कि वह जाली नोट तैयार कर सके. सरकार को इस सम्बन्ध में उचित कदम उठाने की जरूरत है. सरकार को ऐसी करंसी तैयार करनी चाहिय कि कोई जाली करंसी बना ही ना सके. सरकार को सख्त से सख्त कानून बनाना चाहिए जिस से जाली करंसी बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके.
जाली करंसी चलने से नुक्सान तो आम व्यक्ती का भी होता है. मान लीजिये, एक व्यक्ती बैंक में अपनी मेहनत की कमाई जमा करवाने गया है. वहां जा कर उसे मालूम पड़ता है कि 500 रूपए का एक नोट जाली है. बैंक कर्मचारी तुरंत उस नोट को ना चलनेयोग्य करने हेतु उसपर पेन से उल्टी - सीधी लाईने खींच देता है. बेचारा आम आदमी रोता हुआ बैंक से बाहर आता है. सरकार को इस समस्या का हल भी ढूंढना चाहिए. आखिर उसका काम जनता की सेवा करना ही तो है. जो मुजरिम हैं उनके साथ मुजरिमों जैसा व्यवहार ही किया जाये.
अंत में:
सरकार को जाली करंसी के विरुद्ध किस तरह के कदम उठाने चाहियें?
जाली करंसी का चलन देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक है. ऐसी भी खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं कि बैंक के ऐ. टी .एम् . से भी जाली करंसी निकल आती है. शामत बेचारे आम आदमी की आ जाती है जो मेहनत से कमाई करता है मगर उसके नसीब में जाती नोट आ जाता है.
आखिर किसी भी व्यक्ती की इतनी हिम्मत क्यों हो कि वह जाली नोट तैयार कर सके. सरकार को इस सम्बन्ध में उचित कदम उठाने की जरूरत है. सरकार को ऐसी करंसी तैयार करनी चाहिय कि कोई जाली करंसी बना ही ना सके. सरकार को सख्त से सख्त कानून बनाना चाहिए जिस से जाली करंसी बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके.
जाली करंसी चलने से नुक्सान तो आम व्यक्ती का भी होता है. मान लीजिये, एक व्यक्ती बैंक में अपनी मेहनत की कमाई जमा करवाने गया है. वहां जा कर उसे मालूम पड़ता है कि 500 रूपए का एक नोट जाली है. बैंक कर्मचारी तुरंत उस नोट को ना चलनेयोग्य करने हेतु उसपर पेन से उल्टी - सीधी लाईने खींच देता है. बेचारा आम आदमी रोता हुआ बैंक से बाहर आता है. सरकार को इस समस्या का हल भी ढूंढना चाहिए. आखिर उसका काम जनता की सेवा करना ही तो है. जो मुजरिम हैं उनके साथ मुजरिमों जैसा व्यवहार ही किया जाये.
अंत में:
सरकार को जाली करंसी के विरुद्ध किस तरह के कदम उठाने चाहियें?
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
विदेश यात्राएं किस लिए?
अक्सर देखने में आया है कि सत्ता में आने के बाद मंत्री महोदय धडाधड विदेश यात्राएं करते हैं. यात्रा करना जरूरी हो चाहे ना हो, वे यात्रा अवश्य करते हैं. दरअसल, उन्हें विदेशी धरती और विदेशी लोगों का मोह हो चूका है. अपनी इन यात्राओं पर मंत्री महोदय करोड़ों रुपये खर्च कर डालते हैं. देश के ये मंत्री महोदय एक बार भी ये नहीं सोचते कि जिस पैसे पर वे लोग विदेश घूमने जा रहे हैं वह इस देश की सौ करोड़ जनता का ही है.
आज ही एक खबर में बताया गया है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पांच सालों में विदेश यात्राओं पर 2 करोड़ 4 लाख 36 हजार 825 रुपए खर्च किए. यह आंकडे जुलाई 2006 से जुलाई 2011 के बीच के हैं इस दौरान मोंटेक ने 16 बार सरकारी खर्चे पर 35 विदेश यात्राएं की. आरटीआई के तहत मांगी एक जानकारी के मुताबिक अहलूवालिया ने इसमें से केवल एक बार अपनी जेब से विदेश यात्रा का खर्च चुकाया. इस जानकारी के मुताबिक मोटंके ने पिछले पांच साल के दौरान 16 बार अमेरिका की सरकारी यात्रा की चार बार ब्रिटेन और चार बार सिंगापुर की यात्रा की. इसके अलावा अहलूवालिया दो-दो बार चीन और फ्रांस की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर की. यही नहीं स्विटजरलैंड, सऊदी अरब, कनाडा, ओमान, बहरीन कोरिया और जापान की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर निपटा डाली.
यह तो केवल एक उदाहरण है. अगर सरकार के एक-एक मंत्री का हिसाब-किताब किया जाए तो विदेश यात्राओं पर होने वाले खर्च का आंकड़ा अरबों में चला जाएगा. सरकार अगर चाहे तो इन यात्राओं पर अच्छे से लगाम लगा सकती है. केवल उन्हीं यात्राओं की इजाजत दी जाए जिन के बिना गुजरा संभव नहीं है. इस से एक बड़ी रकम बच सकती है, जिस से कई सरकारी योजनाओं को मुकम्मल किया जा सकता है. वैसे भी आजकल आईटी का जमाना है. क्यों नहीं विडियो कांफेरेंसस का सहारा लिया जाता?
एक बात और. अब जब कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने की बात की जा रही है तो क्यों ना मंत्रिओं के विदेशी दौरों संबंधी मुकम्मल जानकारी सम्बंधित मंत्रालयों की वेबसाइट पर डाली जाए ताकि देश कि जनता को भी मालूम हो सके कि यात्रा का उद्देश्य क्या था, उस पर कितना खर्चा हुआ और उससे हासिल क्या हुआ.
अंत में:
क्या मंत्रिओं की यात्राओं का मुकम्मल हिसाब-किताब सार्वजानिक किया जाना चाहिए?
आज ही एक खबर में बताया गया है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने पांच सालों में विदेश यात्राओं पर 2 करोड़ 4 लाख 36 हजार 825 रुपए खर्च किए. यह आंकडे जुलाई 2006 से जुलाई 2011 के बीच के हैं इस दौरान मोंटेक ने 16 बार सरकारी खर्चे पर 35 विदेश यात्राएं की. आरटीआई के तहत मांगी एक जानकारी के मुताबिक अहलूवालिया ने इसमें से केवल एक बार अपनी जेब से विदेश यात्रा का खर्च चुकाया. इस जानकारी के मुताबिक मोटंके ने पिछले पांच साल के दौरान 16 बार अमेरिका की सरकारी यात्रा की चार बार ब्रिटेन और चार बार सिंगापुर की यात्रा की. इसके अलावा अहलूवालिया दो-दो बार चीन और फ्रांस की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर की. यही नहीं स्विटजरलैंड, सऊदी अरब, कनाडा, ओमान, बहरीन कोरिया और जापान की यात्रा भी सरकारी खर्चे पर निपटा डाली.
यह तो केवल एक उदाहरण है. अगर सरकार के एक-एक मंत्री का हिसाब-किताब किया जाए तो विदेश यात्राओं पर होने वाले खर्च का आंकड़ा अरबों में चला जाएगा. सरकार अगर चाहे तो इन यात्राओं पर अच्छे से लगाम लगा सकती है. केवल उन्हीं यात्राओं की इजाजत दी जाए जिन के बिना गुजरा संभव नहीं है. इस से एक बड़ी रकम बच सकती है, जिस से कई सरकारी योजनाओं को मुकम्मल किया जा सकता है. वैसे भी आजकल आईटी का जमाना है. क्यों नहीं विडियो कांफेरेंसस का सहारा लिया जाता?
एक बात और. अब जब कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने की बात की जा रही है तो क्यों ना मंत्रिओं के विदेशी दौरों संबंधी मुकम्मल जानकारी सम्बंधित मंत्रालयों की वेबसाइट पर डाली जाए ताकि देश कि जनता को भी मालूम हो सके कि यात्रा का उद्देश्य क्या था, उस पर कितना खर्चा हुआ और उससे हासिल क्या हुआ.
अंत में:
क्या मंत्रिओं की यात्राओं का मुकम्मल हिसाब-किताब सार्वजानिक किया जाना चाहिए?
गुरुवार, 22 सितंबर 2011
आखिर किस पर विश्वास करें?
जी हाँ. आज देश के लगभग हर नागरिक के मन में यही प्रश्न घूम रहा है. आखिर विश्वास किया जाये तो किस पर किया जाये. देश के जो नेता शराफत से ओत-प्रोत लगते हैं वे भी अब घोटालों की दलदल में फंसे हुए दिख रहे हैं.
और तो और, अब पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम का नाम शामिल हो गया है. आरटीआई के जरिए सामने आई वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे. लेकिन उन्होंने 30 जनवरी, 2008 को ए राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी. उन्होंने कहा- मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू शेयरिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता। यह चिट्ठी 25 मार्च, 2011 को लिखी गई थी. चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी. 11 पन्नों की ये चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदंबरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्टी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है.
अब कहने या सोचने की और कोई जरूरत नहीं है.
जिस तरह से बड़े - बड़े नेताओं का नाम घोटालों में शामिल होता जा रहा है, देश की जनता में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है. जनता इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर वह करे भी तो क्या करे. चुनाव में किस को वोट डाले, और डाले भी तो क्यों? जनता को मजबूरी में वोट तो डालनी ही पड़ती है. आखिर सरकार का गठन भी तो करना होता है, जिस ने देश की जनता पर शासन करना होता है. सिर्फ शासन. बदले में देश की जनता को महंगाई तोहफे में मिलती है. और बड़े-बड़े घोटाले किये जाते हैं.नेताओं द्वारा जनता सोचने पर मजबूर है कि क्या सरकार में बैठे नेताओं को मात्र घोटालों के लिए ही चुन कर भेजा गया है? देश के प्रति उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं? आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा.
बेशक अन्ना टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. आशा है, वह सुबह जरूर आयेगी जब देश के हर नेता की जनता के सामने मुकम्मल जवाबदेही होगी.
न्यायसंगत बात तो यह होनी चाहिए कि घोटालों में शामिल नेताओं से सारी रकम वापस वसूली जाये. साथ ही ऐसे नेताओं को हमेशा के लिए चुनाव में खड़े से वर्जित किया जाये . जनता को भी चहिये कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार होना चाहिए.
अंत में:
भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के साथ कैसा व्यवहार होने चाहिए?
और तो और, अब पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2जी घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम का नाम शामिल हो गया है. आरटीआई के जरिए सामने आई वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो 2जी घोटाला रोक सकते थे. लेकिन उन्होंने 30 जनवरी, 2008 को ए राजा से मीटिंग में उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी. उन्होंने कहा- मैं अब एंट्री फीस या रेवेन्यू शेयरिंग की वर्तमान दरों को रीविजिट (समीक्षा) नहीं करना चाहता। यह चिट्ठी 25 मार्च, 2011 को लिखी गई थी. चिट्ठी में कहा गया है कि अगर चिदंबरम चाहते तो स्पेक्ट्रम की पहले आओ, पहले पाओ की जगह उचित कीमत पर नीलामी की जा सकती थी. 11 पन्नों की ये चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदंबरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। यह चिट्टी आरटीआई के तहत विवेक गर्ग ने हासिल की है.
अब कहने या सोचने की और कोई जरूरत नहीं है.
जिस तरह से बड़े - बड़े नेताओं का नाम घोटालों में शामिल होता जा रहा है, देश की जनता में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है. जनता इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर वह करे भी तो क्या करे. चुनाव में किस को वोट डाले, और डाले भी तो क्यों? जनता को मजबूरी में वोट तो डालनी ही पड़ती है. आखिर सरकार का गठन भी तो करना होता है, जिस ने देश की जनता पर शासन करना होता है. सिर्फ शासन. बदले में देश की जनता को महंगाई तोहफे में मिलती है. और बड़े-बड़े घोटाले किये जाते हैं.नेताओं द्वारा जनता सोचने पर मजबूर है कि क्या सरकार में बैठे नेताओं को मात्र घोटालों के लिए ही चुन कर भेजा गया है? देश के प्रति उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं? आखिर ऐसे कब तक चलता रहेगा.
बेशक अन्ना टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया है. मगर, इतना ही काफी नहीं लगता है. आशा है, वह सुबह जरूर आयेगी जब देश के हर नेता की जनता के सामने मुकम्मल जवाबदेही होगी.
न्यायसंगत बात तो यह होनी चाहिए कि घोटालों में शामिल नेताओं से सारी रकम वापस वसूली जाये. साथ ही ऐसे नेताओं को हमेशा के लिए चुनाव में खड़े से वर्जित किया जाये . जनता को भी चहिये कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार होना चाहिए.
अंत में:
भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के साथ कैसा व्यवहार होने चाहिए?
बुधवार, 21 सितंबर 2011
आखिर कब तक?
जम्मू के सांबा सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सीमा की बैनगलाड़ पोस्ट पर मंगलवार ढाई बजे पाकिस्तान की ओर से फायरिंग की गई। पाकिस्तान की चिमनी गलाड़ और गलाड़ टांडा पोस्ट से हुई इस फायरिंग में बीएसएफ की 59 बटालियन के सब इंस्पेक्टर राम चंद्र राणा शहीद हो गए. राम चंद्र राणा कालोनी आजादपुर जिला देहरादून, उत्तराखंड के रहने वाले थे । बेहद खेदपूर्ण बात है कि
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर इस तरह की घटनाएँ हो रहीं हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. ख़बरों के मुताबिक सांबा सेक्टर में पाक की ओर से एक सप्ताह में दूसरी बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया है.
विचारयोग्य बात ये है कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा. कब तक इस तरह देश के सिपाही शहीद होते रहेंगे. ऐसी घटनाओं पर देश के बड़े नेता खामोश क्यों हो जाते हैं. ऐसी घटनाओं की सार्वजानिक तौर पर निंदा क्यों नहीं करते. क्यों नहीं कहते कि संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मामला उठाया जाएगा. क्या देश के नेताओं के लिए सीमा पर होने वाली ऐसी घटनायें कोई मायने नहीं रखतीं?
सच तो ये है कि देश के नेताओं को एक दूसरे पर टीका-टिपण्णी करने से ही फुर्सत नहीं है. फुर्सत होगी तभी तो नेता लोग अन्य मुद्दों के बारे में सोच सकेंगे.
अंत में:
संघर्ष विराम का बार-बार उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के विरुद्ध क्या रणनीति होनी चाहिए?
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर इस तरह की घटनाएँ हो रहीं हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. ख़बरों के मुताबिक सांबा सेक्टर में पाक की ओर से एक सप्ताह में दूसरी बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया है.
विचारयोग्य बात ये है कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा. कब तक इस तरह देश के सिपाही शहीद होते रहेंगे. ऐसी घटनाओं पर देश के बड़े नेता खामोश क्यों हो जाते हैं. ऐसी घटनाओं की सार्वजानिक तौर पर निंदा क्यों नहीं करते. क्यों नहीं कहते कि संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मामला उठाया जाएगा. क्या देश के नेताओं के लिए सीमा पर होने वाली ऐसी घटनायें कोई मायने नहीं रखतीं?
सच तो ये है कि देश के नेताओं को एक दूसरे पर टीका-टिपण्णी करने से ही फुर्सत नहीं है. फुर्सत होगी तभी तो नेता लोग अन्य मुद्दों के बारे में सोच सकेंगे.
अंत में:
संघर्ष विराम का बार-बार उल्लंघन करने के लिए पकिस्तान के विरुद्ध क्या रणनीति होनी चाहिए?
मंगलवार, 20 सितंबर 2011
आत्महत्या क्यों?
उदयपुर से एक बेहद दुखद समाचार पढने में आया है. गोगुंदा थाना क्षेत्र एक मां ने अपनी पंद्रह दिन की मासूम बच्ची को छोड़कर खुद आत्महत्या कर ली. मंगलवार शाम उसका शव घर के पास ही एनीकट में मिला। वह सोमवार रात से ही लापता था, मंगलवार सुबह उसका शव मिलने पर आत्महत्या का पता चला. मृतका लक्ष्मी (27) पत्नी वालू गमेती थी.
सच है कि आत्महत्या की ऐसी घटनाएँ अक्सर होती रहती हें. इंसान का जब स्वयं पर काबू नहीं रहता तो वह ऐसा ही करता है. लेकिन, आत्महत्या किसी भी समस्या का हल नहीं है. हर मानव के जीवन में कोई न समस्या होती ही है. मगर, इस का मतलब यह तो नहीं कि आत्महत्या ही कर ली जाये. एक व्यक्ति अकेला नहीं होता. उसके साथ कई और रिश्ते भी जुड़े होते हैं. कई और लोग भी उसपर निर्भर होते हैं. लक्ष्मी तो चले गयी. उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली है. इस घटना के पीछे के हालत कुछ भी हो सकते हैं. उसने आत्महत्या करके अपने साथ तो अन्याय किया ही है, अपनी नवजात बेटी के साथ तो घोर अन्याय किया है. उसकी नवजात बेटी बड़ी हो कर अपनी माँ के बारे में क्या सोचेगी. यही कि वह एक कायर माँ की औलाद है. उस बेचारी को अपना तमाम बचपन माँ की गोद व् दुलार के बिना ही गुजारना होगा. इस संसार के लोग बार-बार उसे याद दिलाएंगे कि उसकी माँ ने आत्महत्या की थी. तब उस पर क्या बीतेगी, इसका अनुमान लगाकर ही दिल कांपने लगता है. अगर लक्ष्मी ने आत्महत्या ही करनी थी तो उसने बेटी को जन्म ही क्यों दिया.
जब कोई व्यक्ति आत्महत्या के बारे में सोचने लगता है तो उसके व्यवहार में कुछ ना कुछ परिवर्तन जरूर आता है. यही वह समय है जब परिवारवालों को ऐसे व्यक्ति के व्यवहार पर नज़र रखनी चाहिए.
अंत में:
आत्महत्या की घटनाओं को किस तरह से रोका जा सकता है?
सच है कि आत्महत्या की ऐसी घटनाएँ अक्सर होती रहती हें. इंसान का जब स्वयं पर काबू नहीं रहता तो वह ऐसा ही करता है. लेकिन, आत्महत्या किसी भी समस्या का हल नहीं है. हर मानव के जीवन में कोई न समस्या होती ही है. मगर, इस का मतलब यह तो नहीं कि आत्महत्या ही कर ली जाये. एक व्यक्ति अकेला नहीं होता. उसके साथ कई और रिश्ते भी जुड़े होते हैं. कई और लोग भी उसपर निर्भर होते हैं. लक्ष्मी तो चले गयी. उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली है. इस घटना के पीछे के हालत कुछ भी हो सकते हैं. उसने आत्महत्या करके अपने साथ तो अन्याय किया ही है, अपनी नवजात बेटी के साथ तो घोर अन्याय किया है. उसकी नवजात बेटी बड़ी हो कर अपनी माँ के बारे में क्या सोचेगी. यही कि वह एक कायर माँ की औलाद है. उस बेचारी को अपना तमाम बचपन माँ की गोद व् दुलार के बिना ही गुजारना होगा. इस संसार के लोग बार-बार उसे याद दिलाएंगे कि उसकी माँ ने आत्महत्या की थी. तब उस पर क्या बीतेगी, इसका अनुमान लगाकर ही दिल कांपने लगता है. अगर लक्ष्मी ने आत्महत्या ही करनी थी तो उसने बेटी को जन्म ही क्यों दिया.
जब कोई व्यक्ति आत्महत्या के बारे में सोचने लगता है तो उसके व्यवहार में कुछ ना कुछ परिवर्तन जरूर आता है. यही वह समय है जब परिवारवालों को ऐसे व्यक्ति के व्यवहार पर नज़र रखनी चाहिए.
अंत में:
आत्महत्या की घटनाओं को किस तरह से रोका जा सकता है?
सोमवार, 19 सितंबर 2011
टोपी पर इतना बवाल क्यों?
ख़बरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा है कि उन्होंने एक मुस्लिम धर्मगुरु की तरफ से भेंट की गई टोपी को कथित तौर पर लेने से मना कर दिया। मुस्लिम धर्मगुरु सैय्यद ईमाम शाही सैय्यद ने गुजरात के मुख्यमंत्री को एक टोपी भेंट की थी। लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टोपी को लेने से मना कर दिया। हालांकि, मोदी ने मुस्लिम धर्म गुरु की तरफ से दी गई शॉल को स्वीकार किया। सैय्यद ने कहा, 'मुझे इससे बहुत दुख हुआ है। वह हर समुदाय की टोपी और पगड़ी पहन रहे हैं। लेकिन उन्होंने मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया।'
आज सुबह से ही टीवी पर यही खबर चल रही है. ऐसा लगता है कि टीवी चैनलवालों के पास ख़बरों का आकाल पद गया है. मैं मुस्लिम धर्मगुरु की भावनाओं के साथ सहमत हूँ. लेकिन, कोई इंसान किसी दूसरे को इस बात के लिए मजबूर नहीं कर संता कि वह उसकी दी हुई वस्तु स्वीकार करे. वैसे भी, मीडिया और अन्य सियासी दलों के नेताओं को टोपी के इस मुद्दे पर इतना बवाल खड़ा नहीं करना चाहिए. उन्हें यह बात गंभीरता से सोचनी चाहिए कि इस मुद्दे पर बवाल मचने से देश में किस तरह के हालात बन सकते हैं. देश में टोपी से बड़े भी कई मुद्दे हैं. मसलन, देहातों का शहरीकरण होना जिस की वजह से खेतिहर भूमि लगातार कम हो रही है, ऋण के बोझ तले दबे किसानों द्वारा आत्महत्या करना, बढ़ती महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, भ्रष्टाचार इत्यादि-इत्यादि.
सवाल है कि अगर मीडिया के कुछ लोगों, कुछ सियासी लोगों एवं अन्य को लगता है कि नरेंद्र मोदी सभी धर्मों का सम्मान नहीं करते तो गुजरात की जनता उन्हें बार-बार अपना मत देकर सत्ता क्यों सौंपती है.
अंत में---
क्या टोपी का मसला देश हित में तुरंत छोड़ देना चाहिए?
आज सुबह से ही टीवी पर यही खबर चल रही है. ऐसा लगता है कि टीवी चैनलवालों के पास ख़बरों का आकाल पद गया है. मैं मुस्लिम धर्मगुरु की भावनाओं के साथ सहमत हूँ. लेकिन, कोई इंसान किसी दूसरे को इस बात के लिए मजबूर नहीं कर संता कि वह उसकी दी हुई वस्तु स्वीकार करे. वैसे भी, मीडिया और अन्य सियासी दलों के नेताओं को टोपी के इस मुद्दे पर इतना बवाल खड़ा नहीं करना चाहिए. उन्हें यह बात गंभीरता से सोचनी चाहिए कि इस मुद्दे पर बवाल मचने से देश में किस तरह के हालात बन सकते हैं. देश में टोपी से बड़े भी कई मुद्दे हैं. मसलन, देहातों का शहरीकरण होना जिस की वजह से खेतिहर भूमि लगातार कम हो रही है, ऋण के बोझ तले दबे किसानों द्वारा आत्महत्या करना, बढ़ती महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, भ्रष्टाचार इत्यादि-इत्यादि.
सवाल है कि अगर मीडिया के कुछ लोगों, कुछ सियासी लोगों एवं अन्य को लगता है कि नरेंद्र मोदी सभी धर्मों का सम्मान नहीं करते तो गुजरात की जनता उन्हें बार-बार अपना मत देकर सत्ता क्यों सौंपती है.
अंत में---
क्या टोपी का मसला देश हित में तुरंत छोड़ देना चाहिए?
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